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    अफगान-पाक सीमा पर तनाव: पाक सेना की कार्रवाई में 372 की मौत, सैकड़ों घायल

    काबुल/इस्लामाबाद: संयुक्त राष्ट्र की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि इस वर्ष की पहली तिमाही में पाकिस्तान और तालिबान के बीच जारी सैन्य गतिरोध ने आम अफगान नागरिकों के लिए नरक जैसी स्थिति पैदा कर दी है। वर्ष 2026 के शुरुआती तीन महीनों में सीमा पार से हुई भीषण गोलाबारी और हवाई हमलों में 372 निर्दोष नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। वर्ष 2011 के बाद से हताहतों का यह आंकड़ा सबसे भयावह स्तर पर पहुंच गया है, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। मानवीय आधार पर स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कई शवों की पहचान करना तक मुश्किल हो रहा है।

    नशा मुक्ति केंद्र पर पाकिस्तान का विनाशकारी हवाई हमला

    इस पूरी हिंसा में सबसे हृदयविदारक घटना 16 मार्च को काबुल में घटित हुई, जब पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने एक नशा मुक्ति केंद्र को निशाना बनाया। इस केंद्र में केवल पुरुष रोगियों का उपचार चल रहा था, लेकिन हमले के बाद यह जगह मलबे और लाशों के ढेर में तब्दील हो गई। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पुष्टि करती है कि केवल इसी एक हमले में 269 लोगों की मौत हुई और सौ से अधिक लोग घायल हो गए। प्रत्यक्षदर्शियों और स्वतंत्र स्रोतों का मानना है कि मृतकों की वास्तविक संख्या रिपोर्ट किए गए आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि धमाके और आग की वजह से कई शरीर पूरी तरह झुलस चुके थे।

    सैन्य अभियानों और आतंकी पनाहगाहों का अंतहीन विवाद

    सीमा पर बढ़ते इस तनाव के पीछे दोनों देशों के अपने-अपने तर्क और आरोप हैं, जिसके कारण युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। पाकिस्तान का दावा है कि उसके सैन्य अभियान केवल 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' (TTP) के ठिकानों और आतंकी बुनियादी ढांचे को नष्ट करने के लिए चलाए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, तालिबान प्रशासन इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अफगानिस्तान की संप्रभुता का सीधा उल्लंघन मान रहा है। फरवरी के अंत में तो पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने इस तनाव को एक 'खुली जंग' तक करार दे दिया था, जिससे स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं।

    युद्धविराम के बीच नागरिक और एनजीओ कार्यकर्ताओं पर अत्याचार

    हिंसा का आलम यह है कि शांति समझौतों और युद्धविराम की घोषणाएं भी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रही हैं। रिपोर्ट में नूरिस्तान की एक दर्दनाक घटना का उल्लेख है, जहाँ एक महिला एनजीओ कार्यकर्ता की उस समय हत्या कर दी गई जब एक दिन पहले ही युद्धविराम पर सहमति बनी थी। उस महिला को गोली लगने के बाद वह अपने तीन साल के मासूम बच्चे के साथ पानी में डूब गई, जो इस युद्ध की संवेदनहीनता को दर्शाता है। संयुक्त राष्ट्र ने अब कड़े शब्दों में दोनों देशों से अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का सम्मान करने और अस्पतालों तथा घनी आबादी वाले नागरिक क्षेत्रों को सैन्य कार्रवाई से दूर रखने की अपील की है।

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