मुंबई: पश्चिम बंगाल के हालिया चुनावी नतीजों में ममता बनर्जी की पराजय के बाद फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपना पुराना दर्द साझा किया है। उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो साझा करते हुए उन संघर्षों को याद किया जो उन्हें अपनी फिल्म 'द बंगाल फाइल्स' की रिलीज के समय झेलने पड़े थे। विवेक ने दावा किया कि सत्ता में रहते हुए ममता बनर्जी ने न केवल उनकी फिल्म को राज्य में बाधित किया, बल्कि उनके खिलाफ कई कानूनी अड़चनें भी पैदा कीं, जिससे उन्हें अपनी कला को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए गुप्त रास्तों का सहारा लेना पड़ा।
प्रतिबंध और धमकियों के बीच फिल्म का संघर्ष
विवेक अग्निहोत्री ने अपने पोस्ट में इस बात का विस्तार से उल्लेख किया है कि कैसे उनकी फिल्म को सिनेमाघरों से हटाने के लिए दबाव बनाया गया और उन पर व्यक्तिगत हमले किए गए। निर्देशक के अनुसार, स्थिति यहाँ तक पहुँच गई थी कि उन्हें बंगाल में प्रवेश करने से रोका गया और वह राज्यपाल से अपना सम्मान प्राप्त करने तक नहीं जा सके। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रेलर लॉन्च रोकने से लेकर मारपीट और ढेरों एफआईआर दर्ज होने के बावजूद उन्होंने घुटने नहीं टेके और सत्य को जनता के सामने लाने का अपना संकल्प जारी रखा।
गुप्त तरीके से फिल्म प्रदर्शन और चुनावी जीत पर खुशी
निर्देशक ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि जब फिल्म को आधिकारिक तौर पर प्रदर्शित होने से रोका गया, तब उन्होंने हार मानने के बजाय 'अंडरग्राउंड' तरीके से चुनाव से पहले लोगों को यह फिल्म दिखाई। विवेक का मानना है कि इस फिल्म ने लोगों की सोच बदलने में अहम भूमिका निभाई और अब चुनावी नतीजों के बाद वह इसे अपनी नैतिक जीत मान रहे हैं। उन्होंने बंगाल की जनता को इस ऐतिहासिक परिवर्तन पर बधाई देते हुए कहा कि अब लोग बिना किसी भय के और सिर उठाकर अपनी संस्कृति और इतिहास के साथ जी सकते हैं।
विवादों के घेरे में 'द बंगाल फाइल्स' की कहानी
1940 के दशक की रक्तरंजित घटनाओं और 'ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स' पर आधारित यह फिल्म अपनी घोषणा के समय से ही विवादों में रही है। जहाँ विवेक अग्निहोत्री इसे विचारधारा और धर्म के टकराव की असली दास्तां बताते हैं, वहीं सरकारी पक्ष ने इसे कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती माना था। हालाँकि आधिकारिक तौर पर राज्य में कोई लिखित प्रतिबंध नहीं लगाया गया था, लेकिन सिनेमाघर मालिकों द्वारा फिल्म न दिखाने के फैसले ने इसे एक बड़ी राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बना दिया था, जो अब सरकार बदलने के बाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।


