More
    Homeमनोरंजन48 साल पहले हुए इस जघन्य अपराध से कांप उठा था देश,...

    48 साल पहले हुए इस जघन्य अपराध से कांप उठा था देश, अब फिर चर्चा में रंगा-बिल्ला केस

    देश की राजधानी में करीब पांच दशक पहले एक ऐसा जघन्य अपराध हुआ था, जिसकी यादें आज भी रूह कंपा देती हैं। यह कहानी है उन दो मासूम भाई-बहनों की, जो घर से सुनहरे भविष्य की उम्मीद लेकर निकले थे, लेकिन कभी वापस नहीं लौट पाए। एक सैन्य अधिकारी के इन बच्चों का अपहरण कर जिस बेरहमी से कत्ल किया गया, उसने रंगा और बिल्ला नाम के दो अपराधियों को भारत के इतिहास के सबसे खूंखार नामों में शुमार कर दिया। इसी ऐतिहासिक और दर्दनाक घटना पर आधारित वेब सीरीज 'राख' कल शुक्रवार को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई है।

    अगस्त 1978: जब खुशियां मातम में बदल गईं

    यह मामला भारतीय अपराध विज्ञान के सबसे डरावने पन्नों में से एक है। 26 अगस्त 1978 को गीता चोपड़ा और उनके छोटे भाई संजय चोपड़ा का अपहरण कर लिया गया। दोनों बच्चे ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) के एक कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे। रास्ते में रंगा और बिल्ला ने उन्हें लिफ्ट देने के बहाने अपनी कार में बैठाया और बंधक बना लिया। इसके बाद उनके साथ जो क्रूरता हुई, उसने न केवल पूरे देश को आक्रोश से भर दिया, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर भारतीयों की सोच को हमेशा के लिए बदल दिया।

    रेडियो पर आवाज का इंतजार और फिर खौफनाक सच

    गीता चोपड़ा (16 वर्ष) और संजय चोपड़ा (13 वर्ष) नौसेना के अधिकारी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा के बच्चे थे। गीता, जो कॉलेज की छात्रा थीं, उन्हें उस दिन मशहूर रेडियो प्रोग्राम 'युवा वाणी' में हिस्सा लेना था। रात 9 बजे जब पूरा परिवार रेडियो सेट के पास गीता की आवाज सुनने के लिए बैठा, तो वहां किसी और की आवाज आ रही थी। घबराए हुए पिता जब बच्चों को लेने पहुंचे, तो पता चला कि वे वहां कभी पहुंचे ही नहीं थे। 28 अगस्त 1978 को एक चरवाहे को जंगल में दो क्षत-विक्षत शव मिले, जिनकी पहचान गीता और संजय के रूप में हुई।

    पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बर्बरता का खुलासा

    चिकित्सीय जांच में जो तथ्य सामने आए, वे किसी भी इंसान का कलेजा चीर देने वाले थे। संजय चोपड़ा के शरीर पर चाकू के 25 वार थे। क्योंकि वह एक अच्छे मुक्केबाज (बॉक्सर) थे, उनके घावों से पता चला कि उन्होंने अपनी और अपनी बहन की रक्षा के लिए अंत तक मुकाबला किया था। गीता के शरीर पर भी कई वार किए गए थे। जांचकर्ताओं ने पाया कि बच्चों ने हमलावरों को भी घायल कर दिया था, और इसी सुराग के पीछे चलते हुए पुलिस अपराधियों तक पहुंच पाई।

    ट्रेन के डिब्बे से हुई गिरफ्तारी और फांसी की सजा

    8 सितंबर 1978 को रंगा और बिल्ला दिल्ली जाने वाली कालका मेल में सवार हुए। वे गलती से सेना के जवानों के लिए आरक्षित कोच में घुस गए थे। जब जवानों ने उनसे परिचय पत्र मांगा, तो उनके संदिग्ध व्यवहार और अखबार में छपी उनकी फोटो ने उनका खेल खत्म कर दिया। दिल्ली पहुंचते ही दोनों को पुलिस के हवाले कर दिया गया। अदालत में चले लंबे मुकदमे के बाद, उन्हें अपहरण और हत्या का दोषी पाया गया। अंततः 31 जनवरी 1982 को तिहाड़ जेल में दोनों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

    वेब सीरीज 'राख' के जरिए यादें ताजा

    निर्देशक प्रोसित रॉय की वेब सीरीज 'राख' इसी रूह कंपा देने वाली घटना को पर्दे पर लेकर आई है। इसमें अली फजल, सोनाली बेंद्रे, आमिर बशीर और दिव्येंदु भट्टाचार्य जैसे मंझे हुए कलाकारों ने काम किया है। यह सीरीज न केवल उस दौर के अपराध को दिखाती है, बल्कि उन दो बच्चों की बहादुरी को भी नमन करती है जिन्होंने मौत के सामने भी हार नहीं मानी।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here