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    नए श्रम कानूनों को लेकर ट्रेड यूनियन ने किया विरोध, बुधवार को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान

    नई दिल्ली। भारत के दस प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने केंद्र सरकार के चार नए श्रम संहिताओं को मजदूर विरोधी और कॉर्पोरेट हितैषी बताते हुए इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग की है। इन यूनियनों ने आगामी बुधवार को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन और हड़ताल का ऐलान किया है। ज्यादातर विपक्षी दलों से जुड़े ये यूनियन पिछले पांच साल से इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं। चारों श्रम संहिताएँ (वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता) वर्ष 2019-20 में संसद से पारित हो चुकी थीं और अब धीरे-धीरे लागू हो रही हैं।
    सरकार का दावा है कि इन संहिताओं से ब्रिटिश काल के 29 जटिल श्रम कानूनों को चार आसान कोड में समेटा गया है, जिससे निवेश बढ़ेगा, रोजगार सृजन होगा और मजदूरों को न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा तथा बेहतर कार्य दशाएं मिलेंगी। लेकिन ट्रेड यूनियनों का कहना है कि ये कानून मजदूरों के साथ धोखा हैं। इनसे कंपनियों को कर्मचारियों को बिना वजह निकालने, शिफ्ट की अवधि बढ़ाने और ठेका मजदूरी को बढ़ावा देने की खुली छूट मिल गई है। मुख्य बदलावों में फैक्ट्रियों में कार्य दिवस 12 घंटे तक करने की अनुमति, महिलाओं के लिए रात्रि पाली की छूट, छंटनी के लिए सरकारी अनुमति की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 कर्मचारी करना और छोटी-मझोली कंपनियों को पहले से ज्यादा छूट शामिल हैं। कारोबारी संगठन इन बदलावों से खुश हैं क्योंकि उनका मानना है कि पुराने कानून मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को पीछे रखते थे। भारत की चार ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा अभी भी 20 प्रतिशत से कम है।
    हालांकि सब एक मत नहीं हैं। छोटे-मझोले उद्यमियों का संगठन ‘एसोसिएशन ऑफ इंडियन एंटरप्रेन्योर्स’ ने भी चिंता जताई है कि नए नियमों से उनका परिचालन खर्च बहुत बढ़ जाएगा और कई सेक्टर में कारोबार बाधित होगा। उन्होंने सरकार से ट्रांजिशन सपोर्ट और लचीला क्रियान्वयन मांगा है। दूसरी ओर, भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने इन संहिताओं का खुला समर्थन किया है और राज्यों से कुछ मामूली मुद्दों पर बातचीत के बाद इन्हें शीघ्र लागू करने को कहा है। श्रम मंत्रालय जून 2024 से अब तक यूनियनों से दर्जन भर बैठकें कर चुका है, पर कोई सहमति नहीं बनी। अब सभी राज्य अपने-अपने नियम बनाकर इन कोड को लागू करेंगे। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि अगर सरकार नहीं झुकी तो बुधवार का विरोध प्रदर्शन सिर्फ शुरुआत होगा।

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