लखनऊ:उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन के सहयोगी जहां जल्द से जल्द सीटें तय करना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत का आकलन करने में थोड़ा और समय लिया जा रहा है। एक तरफ उम्मीदवारों की जीत की क्षमता को प्राथमिकता दी जा रही है, तो दूसरी तरफ अपने बढ़ते राजनीतिक प्रभाव का हवाला देकर अधिक सीटों की दावेदारी की जा रही है।
इसके चलते सीट बंटवारे के तय फार्मूले पर फिलहाल पूर्ण सहमति नहीं बन पा रही है। दरअसल, दोनों प्रमुख सहयोगियों ने चुनाव से पहले अपने-अपने आंतरिक सर्वेक्षण कराए हैं। एक पक्ष के सर्वे में पिछले चुनाव के मुकाबले कहीं अधिक सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है, हालांकि बहुमत के आंकड़े से थोड़ी दूरी बनी हुई है।
सीटों की मांग और हर जिले में मौजूदगी की रणनीति
दूसरी ओर, सहयोगी दल ने 100 से अधिक सीटों पर अपनी जीत की संभावना जताई है। दोनों दलों ने अपने सर्वे के परिणाम एक-दूसरे के साथ साझा कर दिए हैं। अब पिछले आम चुनाव के बेहतर प्रदर्शन को आधार बनाकर सीटों का दावा किया जा रहा है। साथ ही रणनीति यह भी है कि राज्य के हर जिले से कम से कम एक सीट पर चुनाव लड़ा जाए, ताकि पूरे प्रदेश में पार्टी की प्रभावी मौजूदगी बनी रहे।
सहयोगी दल अब राज्य में केवल छोटे घटक की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहता, जिसे मुख्य दल के लिए स्वीकार करना काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। हालांकि, दोनों पक्षों का मानना है कि यदि उनके मौजूदा जनाधार में नए मतदाताओं का समर्थन जुड़ जाता है, तो चुनावी राह आसान हो सकती है।
जीती हुई सीटों का समीकरण और संभावित प्रत्याशी
मुख्य दल ने अपने सहयोगी को स्पष्ट संदेश दिया है कि सीटों की संख्या और संभावित उम्मीदवारों के नाम जल्द तय कर लिए जाएं, ताकि जातीय व क्षेत्रीय समीकरणों का सही संतुलन बनाया जा सके। शुरुआत में सहयोगी दल को उतनी ही सीटें देने पर विचार किया जा रहा था जितनी पिछले चुनाव में अन्य सहयोगियों को दी गई थीं (जो 60 से कम थीं)। हालांकि, बदली राजनीतिक परिस्थितियों में यह संख्या 75 से 80 तक पहुंच सकती है।
विपक्षी दल की जीती हुई सीटों पर ही मुख्य रूप से सहयोगी पार्टी को मौका दिया जाएगा। मुख्य दल अपनी सभी 111 जीती हुई सीटों पर खुद ही चुनाव लड़ेगा और अधिकांश मौजूदा विधायकों को फिर से मैदान में उतरने के निर्देश दे दिए गए हैं। दल छोड़कर गए नेताओं को घेरने के लिए संयुक्त रूप से विशेष रणनीति तैयार की जा रही है।
बदले माहौल और नए मतदाताओं को साधने की चुनौती
गठबंधन के सामने मुख्य चुनौती पिछले चुनाव की सफलता को नए राजनीतिक परिदृश्य में दोहराने की है। वर्तमान में राजनीतिक मुद्दे और माहौल दोनों बदल चुके हैं। विशेष रूप से युवा पीढ़ी और नए मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए पारंपरिक गोलबंदी से हटकर नई रणनीति की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
युवाओं और महिलाओं पर विशेष फोकस
एक तरफ जहां शीर्ष नेतृत्व युवाओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने का प्रयास कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं और नए वर्ग का समर्थन हासिल करने के लिए अलग-अलग कार्ययोजनाओं पर काम शुरू किया गया है।


