More
    Homeराज्यमध्यप्रदेशअनूठा मंदिर: माता के लिए नहीं चढ़ते फल-फूल, भक्तों की श्रद्धा में...

    अनूठा मंदिर: माता के लिए नहीं चढ़ते फल-फूल, भक्तों की श्रद्धा में शामिल होते हैं जूते-चप्पल; परंपरा का कारण है हैरान करने वाला

    भोपालः देशभर में शारदीय नवरात्रि बड़े धूम धाम से मनाई जा रही है। माता के अलग-अलग मंदिर आस्था का केंद्र बने हुए हैं। भक्त देवी मंदिरों में दर्शन करने के लिए पहुंच कर हाजिरी लगा रहे हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक अनोखा मंदिर एमपी की राजधानी भोपाल में स्थित है। कोलार इलाके में बने सिद्धिदात्री पहाड़वाली मंदिर में नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। इस सिद्धिदात्री पहाड़वाला मंदिर की परंपरा बेहद अनूठी है। यहां भक्त देवी मां को फल, फूल या मिठाई नहीं, बल्कि जूते-चप्पल अर्पित करते हैं। भक्त मानते हैं कि यह अर्पण देवी को प्रिय है और जरूरतमंदों के लिए भी उपयोगी साबित होता है। नवरात्रि में यहां भक्तों का चढ़ावा बढ़ जाता है।

    एक सपने से हुई मंदिर की शुरुआत
    करीब 30 साल पहले कोलार की पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर की नींव एक सपने के बाद पड़ी थी। जिसमें देवी ने कई भक्तों को एक जैसा सपना दिया। उनके अनुसार, देवी ने आदेश दिया कि कोई भी लड़की नंगे पांव न चले। इसी संदेश को मानकर मंदिर की स्थापना हुई और यहां जूते-चप्पल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।

    30 सालों से चल रही अनोखी परंपरा
    मंदिर के संस्थापक ओमप्रकाश गुप्ता बताते हैं, '1994 में यहां शिव-पार्वती विवाह और यज्ञ का आयोजन किया गया था। इसके बाद मंदिर निर्माण शुरू हुआ। 1995 से लगातार भक्तों की भीड़ यहां पहुंच रही है। मां सिद्धिदात्री हर मनोकामना पूरी करती हैं। जब भक्तों की इच्छाएं पूरी हो जाती हैं, तो वे आभार व्यक्त करने के लिए फिर से जूते-चप्पल अर्पित करते हैं।'

    जूते चप्पल चढ़ाने की अनोखी कथा
    मंदिर के पुजारी गुप्ता ने बताया कि देवी मेरे सपने में प्रकट हुईं और मुझे निर्देश दिया कि कोई भी लड़की, खासकर बच्चे, नंगे पैर न घूमें। कुछ अन्य भक्तों ने भी ऐसा ही सपना देखने का दावा किया है। तब से मंदिर में प्रसाद के रूप में जूते-चप्पल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है।

    300 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचते हैं श्रद्धालु
    देवी सिद्धिदात्री के गर्भगृह तक पहुंचने के लिए भक्तों को लगभग 300 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। गुप्ता के मुताबिक, सामान्य दिनों में रोजाना करीब 50 से 60 जोड़ी जूते-चप्पल चढ़ाए जाते हैं, जबकि नवरात्रि जैसे पर्व में यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। पुजारी ने बताया कि जूते-चप्पल चढ़ाने का विशेष नियम है। इसके तहत केवल बच्चों का फुटवियर सीधे देवी को अर्पित किया जाता है। वहीं,बड़ों के जूते-चप्पल मंदिर परिसर में रखे डिब्बों में जमा किए जाते हैं।

    ज़रूरतमंद बच्चियों तक पहुंचते हैं जूते
    मंदिर में अर्पित सभी जूते-चप्पल बाद में सावधानी से इकट्ठे किए जाते हैं और आसपास के क्षेत्रों की जरूरतमंद लड़कियों तक पहुंचाए जाते हैं। यह पहल उन बच्चियों के लिए मददगार साबित होती है, जिनके पास पहनने के लिए पर्याप्त साधन नहीं होते।
    मैहर में नवरात्रि का मेला शुरू: जहां आज भी पूजा करने आते आल्हा-उदल, 600 जवानों की निगरानी में है मां शारदा धाम

    विदेशों से भी आते हैं जूते
    यह परंपरा केवल भोपाल या मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग डाक के ज़रिए जूते-चप्पल भेजते हैं। उन्हें पहले देवी को अर्पित किया जाता है और फिर ज़रूरतमंदों तक पहुंचा दिया जाता है। ओमप्रकाश गुप्ता का मानना है कि इस परंपरा ने देवी मंदिर को विशेष पहचान दी है और लोगों में दान की भावना को और मजबूत किया है।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here