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    विजय को सरकार बनाने का न्योता नहीं, राज्यपाल के फैसले पर उठे सवाल

    चेन्नई: तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता के समीकरणों को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) राज्य में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन 234 सीटों वाली विधानसभा में वह बहुमत के लिए आवश्यक 118 के जादुई आंकड़े से थोड़ा पीछे रह गई है। इस बीच, विजय ने अन्य राजनीतिक संगठनों से सहयोग की अपील करते हुए कार्यवाहक राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर से भेंट कर सरकार बनाने की मंशा जताई है, हालांकि राज्यपाल की ओर से अभी तक उन्हें शपथ ग्रहण के लिए न्योता नहीं दिया गया है, जिसने राज्य में एक नए संवैधानिक विवाद को जन्म दे दिया है।

    सबसे बड़े दल के अधिकार और संवैधानिक मर्यादा

    तमिलनाडु की वर्तमान स्थिति पर अपनी राय रखते हुए वंचित बहुजन आघाड़ी के नेता प्रकाश आंबेडकर ने विजय के समर्थन में मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुसार राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी के नेता के रूप में विजय को ही मुख्यमंत्री बनने के लिए आमंत्रित करना चाहिए। आंबेडकर का तर्क है कि राज्यपाल केवल बहुमत के संदेह के आधार पर सबसे बड़े दल के दावे को खारिज नहीं कर सकते, बल्कि संविधान की गरिमा को ध्यान में रखते हुए उन्हें पहली प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि वे सदन के पटल पर अपनी शक्ति का परीक्षण कर सकें।

    ऐतिहासिक उदाहरणों के माध्यम से शक्ति परीक्षण की वकालत

    प्रकाश आंबेडकर ने अपने पक्ष को मजबूती देने के लिए भारतीय लोकतंत्र के दो प्रमुख ऐतिहासिक वाक्यों का उल्लेख किया है। उन्होंने 1989 के आम चुनावों का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे राष्ट्रपति ने बहुमत न होने के बावजूद सबसे बड़े दल कांग्रेस को पहले आमंत्रित किया था और बाद में वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इसी प्रकार, उन्होंने 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के उस कार्यकाल का भी जिक्र किया जब भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का मौका मिला था, भले ही वह सरकार केवल तेरह दिनों तक चली थी, लेकिन संसदीय प्रक्रियाओं का पालन करते हुए उन्हें अवसर दिया गया था।

    बहुमत साबित करने की जिम्मेदारी और भविष्य की राह

    संविधान के अनुच्छेद 164 (2) का हवाला देते हुए यह बात जोर-शोर से उठाई जा रही है कि बहुमत का फैसला राजभवन के कमरों में नहीं बल्कि विधानसभा के भीतर होना चाहिए। प्रकाश आंबेडकर ने पुरजोर तरीके से कहा है कि राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर को विजय को मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के लिए विधिवत न्योता देना चाहिए, जिसके बाद विजय का यह उत्तरदायित्व होगा कि वे सदन के भीतर अपनी संख्या बल और अन्य दलों के समर्थन का प्रमाण प्रस्तुत करें। अब सबकी नजरें राजभवन के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या वहां से विजय को अपना बहुमत सिद्ध करने का मौका मिलता है या राज्य किसी और राजनीतिक दिशा की ओर मुड़ता है।

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