लंदन। डेनमार्क में हुए एक दिलचस्प और अनूठे शोध में यह बात सामने आई है कि बेटी के पिता बनने के बाद पुरुषों के मन-मस्तिष्क और महिलाओं के प्रति उनके दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव आता है। इस बदलाव का सीधा असर कार्यस्थल पर उनके फैसलों पर भी पड़ता है, जिससे महिलाओं के अधिकारों, नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी और करियर में तरक्की को लेकर पुरुषों की संवेदनशीलता काफी बढ़ जाती है।
शोध के चौंकाने वाले आंकड़े और कार्यस्थल पर बदलाव
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता मदालेना रोंची और आरहूस यूनिवर्सिटी की नीना स्मिथ द्वारा किए गए इस व्यापक अध्ययन में वर्ष 1992 से 2017 तक के डेनमार्क के सरकारी रोजगार रिकॉर्ड का बारीकी से अध्ययन किया गया। शोध के दौरान ऐसे पुरुष प्रबंधकों (मैनेजर्स) के कार्यव्यवहार को परखा गया जिनकी पहली संतान बेटा या बेटी हुई थी। इसके बाद दोनों समूहों के दफ्तरों में महिलाओं की नियुक्ति और उनकी आय में आए बदलावों की तुलना की गई। अध्ययन में यह पाया गया कि जिन पुरुष प्रबंधकों के घर पहली संतान के रूप में बेटी का जन्म हुआ, उनके संस्थानों और कंपनियों में महिलाओं की नौकरियों में औसतन 2.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके अलावा, पुरुषों के मुकाबले महिला कर्मचारियों की कमाई में भी 4.4 प्रतिशत तक का इजाफा देखा गया। यह सकारात्मक बदलाव केवल महिला कर्मचारियों की संख्या तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उच्च शिक्षा प्राप्त, पूर्णकालिक और बेहतर वेतन वाली महिलाओं को लीडरशिप या महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने में भी साफ वृद्धि देखने को मिली।
सोच में आंतरिक बदलाव और कारोबारी प्रदर्शन
शोधकर्ताओं का मानना है कि बेटी का पिता बनने के बाद लैंगिक असमानता का मुद्दा किसी पुरुष के लिए केवल एक सामान्य सामाजिक चर्चा का विषय नहीं रह जाता, बल्कि वह इसे अपने निजी परिवार से जुड़ा हुआ महसूस करने लगता है। यदि कोई व्यक्ति पहले दफ्तरों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को मामूली बात समझता था, तो अपनी खुद की बेटी के भविष्य को लेकर उसकी चिंता उसे इस मुद्दे के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है। यह मनोवैज्ञानिक बदलाव भीतर से होता है, जिससे महिलाओं की क्षमता और उनके अधिकारों को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल जाता है और इसका प्रभाव धीरे-धीरे पेशेवर फैसलों में भी दिखाई देने लगता है। सबसे खास बात यह रही कि महिलाओं की नियुक्ति और उनकी हिस्सेदारी बढ़ने के बाद भी संबंधित कंपनियों के व्यावसायिक प्रदर्शन में किसी भी प्रकार की गिरावट दर्ज नहीं की गई, जो इस बात को मजबूती से साबित करता है कि दफ्तरों में महिलाओं को समान अवसर देने से कारोबार पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता।
शोध की सीमाएं और भारत के संदर्भ में स्थिति
विशेषज्ञों का कहना है कि इस रिसर्च के नतीजों को समझते समय थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है। हालांकि सरकारी रिकॉर्ड इस बात का अकाट्य सबूत देते हैं कि मैनेजरों के फैसलों में बदलाव आया है, लेकिन यह पूरी तरह से यह प्रमाणित नहीं करते कि इस बदलाव का एकमात्र कारण सिर्फ बेटी का जन्म ही था। इसके अलावा, डेनमार्क और भारत के सामाजिक तथा कामकाजी माहौल में जमीन-आसमान का फर्क है, इसलिए इस शोध के आंकड़ों को ज्यों का त्यों भारत पर लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी, भारत में महिलाओं के रोजगार और नेतृत्व की वर्तमान स्थिति पर गौर करना बेहद जरूरी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय औपचारिक क्षेत्र की कंपनियों में एंट्री-लेवल यानी शुरुआती स्तर की नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत है, जो मैनेजर के पदों पर आते-आते घटकर 24 प्रतिशत और शीर्ष यानी सी-सूट के स्तर पर केवल 17 प्रतिशत तक ही सिमट जाती है। यह जगजाहिर है कि एक पिता और बेटी का रिश्ता बेहद अद्भुत होता है और अब विज्ञान तथा शोध भी इस बात की तस्दीक करने लगे हैं कि एक बेटी का पिता बनना पुरुष के जीवन और उसके दृष्टिकोण में व्यापक बदलाव लाने की ताकत रखता है।


