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    गुप्त नवरात्र शक्ति साधना, तांत्रिक अनुष्ठान और दस महाविद्याओं की आराधना का सर्वोत्तम काल

    पुष्य नक्षत्र और सिद्ध योग के दुर्लभ संयोग में होगी कलश स्थापना, गुप्त नवरात्र का शुभारंभ 15 जुलाई से

    लक्ष्मणगढ़। आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा के अवसर पर 15 जुलाई से गुप्त नवरात्र का शुभारंभ होगा। इस वर्ष गुप्त नवरात्र की शुरुआत पुष्य नक्षत्र, सिद्ध योग और हर्षण योग के दुर्लभ एवं शुभ संयोग में होने से इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ गया है। श्रद्धालु शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना कर मां भगवती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करेंगे तथा नौ दिनों तक शक्ति साधना, जप, हवन और देवी उपासना में लीन रहेंगे।

    योग शिक्षक पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि गुप्त नवरात्र को शक्ति साधना, तांत्रिक अनुष्ठान और दस महाविद्याओं की आराधना का सर्वोत्तम काल माना जाता है। इस दौरान मंदिरों के साथ-साथ घरों में भी विशेष पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ, देवी मंत्रों का जाप और हवन किए जाएंगे। वर्ष में दो बार गुप्त नवरात्र मनाए जाते हैं। पहला माघ माह और दूसरा आषाढ़ माह में आता है।

    उन्होंने बताया कि सामान्य नवरात्र की तुलना में गुप्त नवरात्र में शक्ति उपासना और तांत्रिक साधनाओं का विशेष महत्व होता है। साधक अपनी साधना को गोपनीय रखते हुए मां भगवती की आराधना करते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से की गई साधना से आध्यात्मिक उन्नति, मनोकामनाओं की पूर्ति तथा विशेष सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

    दस महाविद्याओं की होगी विशेष आराधना

    गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं—महाकाली, तारा, त्रिपुरसुंदरी (षोडशी), भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला—की विशेष पूजा की जाती है। प्रत्येक महाविद्या का अपना अलग आध्यात्मिक एवं तांत्रिक महत्व है। साधक अपनी गुरु परंपरा एवं साधना पद्धति के अनुसार इनकी उपासना करते हैं।

    आरोग्य और ग्रहदोषों से राहत की मान्यता

    पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि आषाढ़ मास के अधिष्ठाता देवता इंद्र और महाकाली हैं। वर्षा ऋतु के दौरान वातावरण में नमी बढ़ने से संक्रामक रोगों की संभावना भी बढ़ जाती है। ऐसे समय में मां दुर्गा की उपासना, दुर्गा सप्तशती, दुर्गा कवच, देवी शतनाम एवं देवी मंत्रों का नियमित पाठ करने से मानसिक शांति, आरोग्य, सुख-समृद्धि और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में की गई शक्ति साधना से शनि, राहु और केतु के अशुभ प्रभावों में भी कमी आती है।

    कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

    • प्रतिपदा तिथि: सूर्योदय से दोपहर 1:30 बजे तक
    • लाभ-अमृत मुहूर्त: प्रातः 5:09 बजे से 8:32 बजे तक
    • शुभ योग: प्रातः 10:14 बजे से 11:55 बजे तक
    • अभिजीत मुहूर्त: 11:28 बजे से 12:22 बजे तक
    • चर-लाभ मुहूर्त: अपराह्न 3:19 बजे से 6:42 बजे तक

    इन शुभ मुहूर्तों में कलश स्थापना एवं मां भगवती की आराधना को विशेष फलदायी माना गया है।

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