सत्संग में आचार्य ने कहा- प्रेम की भाषा न समझने वालों को सुदर्शन चक्र की भाषा समझानी पड़ती है
भीलवाड़ा। अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगतगुरु आचार्य स्वामी रामदयालजी महाराज ने कहा कि मनुष्य की दृष्टि जैसी होती है, उसे सृष्टि भी वैसी ही दिखाई देती है। इसलिए जीवन में दूसरों के दोष तलाशने के बजाय उनके गुणों और अच्छाइयों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारी दृष्टि में कमी देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जबकि जीवन को सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ देखना चाहिए।
माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में चल रहे ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत बुधवार को आयोजित दैनिक सत्संग में आचार्य रामदयालजी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए यह विचार व्यक्त किए।
युधिष्ठिर और दुर्योधन का उदाहरण देकर समझाया दृष्टि भेद
आचार्यश्री ने युधिष्ठिर और दुर्योधन का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों एक ही गुरु के शिष्य थे, लेकिन उनकी दृष्टि अलग-अलग थी। युधिष्ठिर को दुनिया में कोई दुर्जन दिखाई नहीं देता था, जबकि दुर्योधन की दृष्टि में कोई सज्जन या धर्मात्मा नहीं था। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति की नजर में अच्छाई नहीं थी तो दूसरे की नजर में बुराई नहीं थी।
उन्होंने कहा कि हमारे जीवन में भी दृष्टि दोष आ गया है। हम दूसरों की कमियां देखने लगे हैं, जबकि हमें उनके गुणों और अच्छाइयों पर नजर रखनी चाहिए। दृष्टिकोण बदलने से जीवन को देखने का नजरिया भी बदल जाता है।
गुरु से शिष्य का कोई व्यवहार छिपा नहीं
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि गुरु से शिष्य की कोई बात या स्वभाव छिपा नहीं रहता। उन्होंने कहा कि गुरु वही है जो अपने शिष्य को अपनी आज्ञा और अनुशासन में रख सके।
उन्होंने परमात्मा और मनुष्य के संबंध को समझाते हुए कहा कि इस धरती पर परमात्मा डायरेक्टर हैं और हम सभी एक्टर हैं। परमात्मा जैसा अभिनय कराते हैं, हम वैसा ही करते जाते हैं।
सगुण-निर्गुण विवाद छोड़ राम नाम की साधना पर जोर
आचार्यश्री ने कहा कि परमात्मा को कोई साकार मानता है तो कोई निराकार, जबकि कुछ लोग परमात्मा के अस्तित्व को ही नकार देते हैं। साकार मानने वाले सगुण उपासक और निराकार मानने वाले निर्गुण उपासक कहलाते हैं।
उन्होंने कहा कि सगुण-निर्गुण के विवाद से ऊपर उठकर राम नाम का भजन करना चाहिए। प्रभु का नाम विवाद के लिए नहीं बल्कि साधना के लिए है। उन्होंने कहा कि यदि हमारी साधना श्रेष्ठ है तो भक्त एक दिन मंदिर जाकर भगवान बन सकता है, लेकिन इंसान रोज मंदिर जाकर भी अपने भीतर परिवर्तन नहीं लाए तो उसका जीवन सार्थक नहीं हो सकता।
जैसी भावना, वैसी ही भगवान की छवि
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि हमारी कल्पना और भावना के अनुरूप ही हमें बहुत कुछ दिखाई देता है। परमात्मा के बारे में जैसी हमारी भावना होती है, वैसी ही उनकी छवि हमारे मन में बनती है। भक्त अपनी भावना के अनुरूप भगवान का श्रृंगार करता है और भगवान की जो छवि एक बार आंखों में बस जाती है, वह आसानी से नहीं बदलती।
उन्होंने कहा कि भगवान आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग रूप धारण कर सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण का उदाहरण देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि जहां प्रेम की आवश्यकता थी, वहां कृष्ण ने बंशी बजाई, लेकिन अज्ञानी, अहंकारी और उपद्रवी लोग प्रेम की भाषा स्वीकार नहीं करते तो उन्हें सुदर्शन चक्र की भाषा समझानी पड़ती है।
सत्संग में आने का भी होता है कोई कारण
आचार्यश्री ने कहा कि संसार में कोई भी कार्य बिना कारण नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति सत्संग में आया है तो इसके पीछे भी कोई कारण है। सत्संग में बैठने से व्यक्ति मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ता है और जब सत्संग पूरी तरह हृदय में उतर जाता है तो जीवन का वास्तविक परिवर्तन शुरू होता है।
आचार्य रामदयालजी महाराज से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन दिया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने भजन प्रस्तुत किए। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की।
सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे तक सत्संग आयोजित किया जा रहा है। इससे पहले सुबह 8.30 से 9 बजे तक रामधुनी के साथ वाणीजी का पाठ होता है। वहीं सूर्यास्त के समय संध्या आरती और रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
मिशनसच न्यूज के लेटेस्ट अपडेट पाने के लिए हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप को जॉइन करें।
https://chat.whatsapp.com/JX13MOGfl1tJUvBmQFDvB1
अन्य खबरों के लिए देखें मिशनसच नेटवर्क


