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    प्रवासी पक्षियों की शरणस्थली सिलीसेढ़ झील को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान

    रामसर साइट घोषित होने से अलवर का गौरव बढ़ा

    मनोज मेहरा , सहायक निदेशक , जनसंपर्क विभाग , अलवर

    मिशन सच न्यूज़ पेपर के पेज नंबर 8 पर इस लेख को पढ़ेhttps://missionsach.com/epapers/mission-sach-e-paper-6-july-2026

    अलवर की ऐतिहासिक और मनोरम सिलीसेढ़ झील को अब रामसर साइट के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल गई है। यह उपलब्धि न केवल अलवर, बल्कि पूरे राजस्थान और भारत के लिए गर्व का विषय है। सिलीसेढ़ झील देश की 96वीं और राजस्थान की 5वीं रामसर साइट बन गई है, जो केवलादेव, सांभर, खिंचन और मेनार झील की गौरवशाली सूची में शामिल हो गई है।

    देश-प्रदेश की राजधानियों के मध्य स्थित अलवर जिले में सरिस्का बाघ अभयारण्य के बफर जोन में, अरावली की सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में बसी यह झील प्राकृतिक सुंदरता का अनुपम उदाहरण है। यह सरिस्का टाइगर रिजर्व का प्रवेश द्वार होने के कारण एक प्रमुख पर्यटन स्थल भी है, जहाँ हर साल देश-विदेश से बड़ी संख्या में सैलानी पहुँचते हैं।

    पक्षी प्रेमियों के लिए धरती पर स्वर्ग

    सिलीसेढ़ झील नवंबर से फरवरी माह के बीच विश्वभर से आने वाले 150 से अधिक प्रजातियों के प्रवासी पक्षियों से गुलजार रहती है। यह झील जैव विविधता का बेजोड़ खजाना है, जहाँ आकर्षक सारसों से लेकर रंग-बिरंगे किंगफिशरों तक हर कदम पर प्रकृति अपने पूरे वैभव के साथ नजर आती है। यहाँ आकाश पंखों की अद्भुत दुनिया से जीवंत हो उठता है, और झील में विचरण करती मछलियां व मगरमच्छ भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं।

    सर्दियों के मौसम में मध्य एशिया , साइबेरिया, मंगोलिया और यूरोप जैसे दूरस्थ देशों से 57 से अधिक प्रजातियों के विदेशी पक्षी प्रजनन और भोजन की तलाश में यहाँ पहुँचते हैं। यहाँ की अनुकूल जलवायु और मौसम इन मेहमान पक्षियों को हर साल बार-बार आमंत्रित करते हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

    बार हेडेड गूज (तिब्बत, चीन, मंगोलिया)
    ग्रेड व्हाइट पेलिकन (यूरोप, मध्य एशिया)
    ग्रीन सैंड पाइपर (यूरोप, साइबेरिया)
    रड्डी शेल्डक (मध्य एशिया, मंगोलिया)
    जैक स्नाइप (साइबेरिया, स्कैंडिनेविया)
    क्रेस्टेड ग्रीब (यूरोप, उत्तरी एशिया)
    नॉर्दर्न शॉवलर (साइबेरिया, यूरेशिया)
    कॉमन स्नाइप (साइबेरिया, उत्तरी यूरोप)
    स्पॉटेड डक (साइबेरिया, उत्तरी यूरोप)
    गैडवॉल (यूरेशिया, नॉर्दर्न पिनटेल)

    इतनी विविध और दूर-दूर से आने वाली प्रजातियों का यहाँ जुटना यह प्रमाणित करता है कि सिलीसेढ़ झील का पारिस्थितिकी तंत्र कितना समृद्ध और स्वस्थ है।

    विरासत में गूंथा इतिहास

    ऐतिहासिक सिलीसेढ़ झील को वर्ष 1845 में महाराजा विनय सिंह ने अलवर को पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनवाया था, जिसका प्रमाण आज भी झील के चारों ओर बनी जल-वाहिकाओं (एक्वाडक्ट्स) में मिलता है। सदियों बाद भी यह झील न केवल अपने ऐतिहासिक महत्व को बनाए हुए है, बल्कि आज पारिस्थितिकी संरक्षण की एक जीवंत मिसाल बन गई है — यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।

    सामूहिक प्रयासों का सुखद परिणाम

    हाल ही में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री तथा अलवर सांसद भूपेंद्र यादव के विशेष प्रयासों से रामसर कन्वेंशन के तहत अलवर की प्रतिष्ठित सिलीसेढ़ झील को रामसर साइट घोषित किया गया है। यह उपलब्धि स्थानीय प्रशासन, वन विभाग और जनप्रतिनिधियों के समन्वित प्रयासों का सुफल है।

    रामसर स्थल के रूप में नामित होने पर सिलीसेढ़ झील को निम्न लाभ प्राप्त होंगे:

    अंतरराष्ट्रीय मान्यता — आर्द्रभूमि (वेटलैंड) के रूप में वैश्विक पहचान
    संरक्षण प्रयासों में वृद्धि — वैज्ञानिक निगरानी और बेहतर प्रबंधन
    सतत विकास के नए अवसर — पारिस्थितिकी-पर्यटन को बढ़ावा
    अंतरराष्ट्रीय सहयोग — तकनीकी और वित्तीय सहायता के द्वार खुलना
    यह जैव-विविधता, जल एवं जलवायु सुरक्षा तथा स्थानीय समुदाय की सतत आजीविका के लिए एक सराहनीय और दूरगामी उपलब्धि है।

    भारत की बढ़ती आर्द्रभूमि क्रांति

    रामसर साइटों की यह निरंतर वृद्धि भारत की आर्द्रभूमि संरक्षण और प्रबंधन के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता को दर्शाती है। रामसर साइटों की बढ़ती संख्या, “अमृत धरोहर” जैसी सराहनीय पहल, और वेटलैंड सिटी की मान्यता — यह सब स्पष्ट रूप से बताते हैं कि भारत आर्द्रभूमियों के संरक्षण को कितनी गंभीरता और गर्व के साथ आगे बढ़ा रहा है।

    संस्कृति और प्रकृति का संगम

    यह उल्लेखनीय है कि जलाशयों का संरक्षण एवं प्रबंधन भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक अभिन्न अंग रहा है। सिलीसेढ़ झील देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए सैर-सपाटे और घूमने-फिरने का एक आकर्षक स्थल तो है ही, इससे कहीं बढ़कर यह क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी भी है — मानव, वन्यजीव और प्रकृति के बीच सामंजस्य का जीवंत प्रतीक।
    सिलीसेढ़ झील की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा है कि प्रकृति के प्रति सजगता और सामूहिक प्रयासों से किस प्रकार किसी स्थल को वैश्विक पहचान दिलाई जा सकती है।

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