राजस्थान के सरकारी स्कूलों में प्रवेश पर रोक ने छेड़ी नई बहस
राजेश खण्डेलवाल, भरतपुर। राजस्थान के सरकारी स्कूलों में संस्था प्रधान की बिना अनुमति के प्रवेश करने और वहां फोटो खींचने के साथ ही ऑडियो-वीडियो बनाने पर भजनलाल सरकार की ओर से लगाई गई रोक ने नई बहस छेड़ दी है। कुछ लोग सरकार के इस फैसले को अनुचित ठहरा रहे हैं, वहीं कुछ इसे उचित बता रहे हैं। कुछ का यह भी कहना है कि फेसबुकिया व यूट्बर्स व्यूज व लाइक्स के चक्कर वह भी दिखा देते हैं, जिसे दिखाया जाना किसी भी मायने में उचित नहीं कहा जा सकता।
राजस्थान में सरकारी स्कूलों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है, लेकिन ऐसे में हालात सुधारने के दिशा में कदम बढ़ाने के बजाए सरकार ने हालातों को दिखाने पर ही रोक लगाना ही बेहतर समझा है और उसमें बच्चों की सुरक्षा, गरिमा व निजता का हवाला दिया गया है। कुछ लोग इस बात के भी पक्षधर है कि सरकारी स्कूलों में सवाल जरूरी हैं, लेकिन माहौल बिगाडकऱ नहीं होने चाहिए।
कुछ सरकारी विद्यालयों के ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिनमें कोई व्यक्ति या कुछ लोग मोबाइल/कैमरे से विद्यालय में रिकॉर्डिंग करते हुए शिक्षकों से लगातार सवाल-जवाब करते दिखाई दे रहे हैं। कई बार ऐसी स्थिति में शिक्षक असहज नजर आते हैं और पूरा विद्यालयी वातावरण डिस्टर्ब होता दिखाई देता है।
यह सही है कि हमारे सरकारी विद्यालयों में वे सभी सुविधाएं अभी तक उपलब्ध नहीं हैं, जो होनी चाहिए। विद्यालयों की संख्या को देखते हुए यह भी वास्तविकता है कि हर कमी को बहुत कम समय में दूर कर पाना आसान नहीं है, लेकिन सुविधाओं की कमी के लिए हर बार शिक्षक को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
अगर विद्यालय में भवन, शौचालय, फर्नीचर, पेयजल, तकनीकी संसाधन या अन्य सुविधाओं की कमी है तो उसके लिए सवाल सरकार से पूछे जाने चाहिए। शिक्षक तब जिम्मेदार हैं, जब उन्हें उनका मूल दायित्व गुणवत्तापूर्ण अध्यापन ईमानदारी से करने का अवसर मिले।
विद्यालय की साफ-सफाई और रखरखाव में विद्यालय स्टाफ और बच्चों की भी जिम्मेदारी है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि हमारे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। इसके बिना केवल सुंदर भवन और बेहतर सुविधाएं भी अधूरी हैं। इसी विषय में राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा विभाग ने हाल ही में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
परिपत्र में कहा गया है कि बिना प्रधानाचार्य/संस्था प्रधान की पूर्व अनुमति बाहरी व्यक्ति को विद्यालय परिसर में प्रवेश नहीं दिया जाए, आगंतुकों की विजिटर रजिस्टर में प्रविष्टि हो तथा बिना अनुमति विद्यालय की कक्षा, प्रयोगशाला, पुस्तकालय आदि क्षेत्रों में प्रवेश न किया जाए। विद्यार्थियों एवं शिक्षकों की फोटो, वीडियो, साक्षात्कार अथवा ऑडियो रिकॉर्डिंग भी बिना पूर्व लिखित अनुमति के नहीं की जाए। बच्चों की निजता, गरिमा और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। यह बात केवल शिक्षकों के सम्मान की नहीं, बल्कि विद्यालय के वातावरण और बच्चों के भविष्य की भी है।
पढऩे वाले बच्चे हमारे हैं, शिक्षक भी हमारे हैं और सरकारी स्कूलों में बेहतर सुविधाओं की मांग करने वाले लोग भी हमारे ही समाज का हिस्सा हैं, इसलिए हमें एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा होने के बजाए एक-दूसरे की भूमिका को समझना होगा। सरकार से सुविधाओं की मांग जरूर करें और शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल जरूर उठाएं। व्यवस्था में कमियां हैं तो उन्हें भी सामने लाना जरूरी है, लेकिन यह सब सम्मानजनक और व्यवस्थित तरीके से हो तो बेहतर है।
विद्यालय पूछताछ का मंच नहीं, बच्चों के सीखने का स्थान है। इसलिए माहौल को दूषित करने के बजाए ऐसा वातावरण बनाया जाना चाहिए, जहां बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी मिले और उन्हें आवश्यक सुविधाएं भी, क्योंकि अंतत: लक्ष्य किसी शिक्षक को कटघरे में खड़ा करना नहीं, अपने बच्चों का भविष्य बेहतर बनाना है।
उधर, कुछ शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे निर्णय सरकार को कभी नहीं लेने चाहिए। प्रदेश की जनता जानती है कि सरकारी स्कूलों का कैसा हाल है? इसलिए इसे छिपाने की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि सरकार को आगे आकर यह कदम उठाना चाहिए कि जहां-जहां स्कूल खराब हैं, लोग वीडियो बनाकर सरकार को भेजें और सरकार वहां तुरंत एक्शन लेकर उनको सुधारने का कार्य करे।
पुरानी कहावत है, निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। ऐसे में सरकार को कुछ छिपाने के बजाए पूरे प्रदेश में सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने के लिए अभियान चलाना चाहिए। ऐसे में राजस्थान सरकार का यह फैसला कितना उचित है और कितना अनुचित?, यह विचारणीय व ज्वलंत सवाल है।
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