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    मजदूर दिवस: 1 मई का सच, जश्न नहीं, मजदूरों की पीड़ा का दिन

    पूर्व विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने कहा नेताओं को चंदा चाहिए इसलिए मजदूर दबा हुआ है। पूरी बातचीत सुनने के लिए क्लिक करें – https://youtu.be/AkDRX0wAAPo?si=kmDlbANv1Ld5V2PR

    मजदूर दिवस पर विशेष
     राजेश रवि , संपादक मिशनसच नेटवर्क, अलवर

    हर वर्ष 1 मई को पूरी दुनिया में मजदूर दिवस मनाया जाता है। यह दिन उन श्रमिकों के संघर्ष, त्याग और अधिकारों की याद दिलाता है, जिन्होंने अपने खून-पसीने से समाज और अर्थव्यवस्था की नींव को मजबूत किया है। भारत में मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 1923 में हुई थी। आज इस परंपरा को 103 वर्ष हो चुके है, लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि इतने लंबे समय के बाद भी देश का मजदूर अपने मूल अधिकारों से पूरी तरह वंचित है।

    बदलता शोषण, नहीं बदलती स्थिति

    यदि हम अतीत और वर्तमान की तुलना करें तो पाएंगे कि पहले मजदूरों का शोषण मुख्यतः निजी उद्योगों और कारखानों तक सीमित था। लेकिन आज स्थिति और अधिक चिंताजनक हो गई है। अब केवल निजी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं में भी मजदूरों को पूरा और न्यायसंगत वेतन नहीं मिल पा रहा है।

    सरकार द्वारा कई क्षेत्रों में संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर कर्मचारियों की भर्ती की जाती है। इन कर्मचारियों से पूरा काम लिया जाता है, लेकिन उन्हें न्यूनतम मजदूरी से भी कम भुगतान किया जाता है। यह स्थिति न केवल श्रम कानूनों की अवहेलना है, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर भी सवाल खड़ा करती है।

    श्रमिकों की बढ़ती संख्या और बदलती परिभाषा

    श्रमिकों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उनकी परिभाषा समय के साथ बदलती रही है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने श्रमिक की परिभाषा को व्यापक बनाया है। वर्तमान में भारत में लगभग 61 करोड़ लोग संगठित और असंगठित श्रमिकों की श्रेणी में आते हैं।

    इसमें केवल फैक्ट्रियों या निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर ही नहीं, बल्कि छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी वाले, घरेलू कामगार और घरों में काम करने वाली महिलाएं भी शामिल हैं। इस व्यापक परिभाषा के बावजूद इन श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा के उपाय अभी भी अपर्याप्त हैं।

    असंगठित क्षेत्र: कानून तो बना, लागू नहीं

    वर्ष 2008 में असंगठित श्रमिकों के कल्याण के लिए एक महत्वपूर्ण अधिनियम बनाया गया था। इस अधिनियम के तहत राज्यों में श्रमिकों के लिए कल्याण बोर्ड गठित किए जाने थे, जो उनकी सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, बीमा और अन्य सुविधाओं का ध्यान रखते।

    लेकिन दुखद बात यह है कि कई राज्यों में आज तक इन कल्याण बोर्डों का गठन ही नहीं हो पाया है या वे प्रभावी रूप से काम नहीं कर रहे हैं। इसका सीधा असर उन करोड़ों श्रमिकों पर पड़ता है, जो पहले से ही आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर हैं।

    न्यूनतम मजदूरी: सरकार भी पीछे
    राजेश याज्ञिक
    राजेश याज्ञिक

    बंधुआ मुक्ति मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष राजेश याज्ञिक ने “मिशन सच” से विशेष बातचीत में एक गंभीर मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि केवल निजी उद्योगों को दोष देना पर्याप्त नहीं है। आज सरकारी योजनाओं में भी श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल रही है। उन्होंने विशेष रूप से VB-G RAM G  (पूर्व में नरेगा) योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें भी कई स्थानों पर मजदूरों को निर्धारित न्यूनतम वेतन से कम भुगतान किया जाता है।

    इसके अलावा, एक नई श्रेणी के श्रमिक गिग वर्कर्स भी सामने आए हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से काम करने वाले ये लोग आज की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन सरकार अभी तक इन्हें पूर्ण रूप से श्रमिक का दर्जा देने को तैयार नहीं है। उन्होंने राज्य सरकार से अपील की है कि कम से कम मजदूर दिवस के अवसर पर गिग वर्कर्स के लिए कोई ठोस नीति या घोषणा की जाए। साथ ही सरकारी विभागों में ठेका प्रणाली के तहत काम करने वाले कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मजदूरी का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।

    राजनीति और मजदूर: प्राथमिकताएं बदल गईं
    ज्ञानदेव आहूजा
    ज्ञानदेव आहूजा

    पूर्व विधायक और श्रम आंदोलनों से करीब 18 वर्षों तक जुड़े रहे ज्ञानदेव आहूजा का मानना है कि आज ट्रेड यूनियन आंदोलन लगभग समाप्त हो चुका है। पहले जहां मजदूरों की आवाज बुलंद करने के लिए यूनियनें सक्रिय रहती थीं, वहीं अब उनकी भूमिका सीमित हो गई है।उनका कहना है कि राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। आज पार्टियों को उद्योगपतियों से मिलने वाले चंदे की अधिक चिंता रहती है, जिसके कारण मजदूरों के हित पीछे छूट जाते हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए भी चिंताजनक है, क्योंकि जब तक समाज का श्रमिक वर्ग सशक्त नहीं होगा, तब तक समग्र विकास की कल्पना अधूरी ही रहेगी।

    सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण

    मजदूरों के अधिकार और समानता की बात केवल आधुनिक युग की नहीं है, बल्कि यह विचार प्राचीन समय से ही विभिन्न धर्मों और महान व्यक्तित्वों द्वारा दिया गया है।राजेश याज्ञिक के अनुसार, ईसा मसीह ने कहा था कि “सूई के छेद से ऊंट निकल सकता है, लेकिन एक शोषक अमीर व्यक्ति को स्वर्ग नहीं मिल सकता।” यह कथन सामाजिक न्याय और समानता की भावना को दर्शाता है।इसी प्रकार इस्लाम धर्म में “जकात” की परंपरा है, जिसमें अतिरिक्त धन को जरूरतमंदों में बांटने की बात कही गई है।

    महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी स्पष्ट कहा था कि मजदूर को उसका मेहनताना तुरंत और पूरा मिलना चाहिए“मजदूर इधर हाथ धोए, उधर उसे भुगतान मिल जाए।”महात्मा गांधी ने भी चंपारण आंदोलन के माध्यम से मजदूरों और किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और यह संदेश दिया कि न्याय के लिए शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ संघर्ष आवश्यक है।

    केवल उत्सव नहीं, संकल्प का दिन

    मजदूर दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं होना चाहिए, बल्कि यह आत्ममंथन और संकल्प का दिन होना चाहिए। यह दिन हमें याद दिलाता है कि विकास की चमक के पीछे मजदूरों का पसीना छिपा होता है।

    आज आवश्यकता है कि सरकार, समाज और उद्योगall stakeholdersमिलकर यह सुनिश्चित करें कि मजदूरों को उनका उचित अधिकार, सम्मान और सुरक्षा मिले।

    यदि हम सच में एक समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा, हर साल 1 मई आएगा और चला जाएगा, लेकिन मजदूर की स्थिति वही की वही बनी रहेगी।

    राजेश रविस्टोरी राइटर –  वरिष्‍ठ पत्रकार राजेश रवि एक दशक तक जनसत्ता और ढाई दशक दैनिक भास्कर में कार्यरत रहे है। भास्कर में अलवर, भीलवाड़ा में डेढ दशक तक संपादक का जिम्‍मा संभाले रहे। वर्तमान में missionsach.com तथा missionsachnetwork.com नाम से वेबसाइट व missionsachnetwork के नाम से यूटयूब चैनल का संचालन करते है। संपर्क मोबाइल 9649856000। email- editor.missionsach@gmail.com

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