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    महिला संगठनों का विरोध बयान: आरक्षण पर शर्तों को रईसा ने बताया अस्वीकार्य

    नारी शक्ति वंदन अधिनियम में शर्तों को लेकर विरोध, आरक्षण को बिना देरी लागू करने की मांग

    जयपुर। महिला आरक्षण को लेकर एक बार फिर सियासी और सामाजिक बहस तेज हो गई है। राष्ट्रीय महिला संगठनों ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम (NSVA) में संशोधन के प्रस्तावित कदम का कड़ा विरोध करते हुए इसे जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताया है।

    अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (AIDWA) की प्रांतीय कोषाध्यक्ष रईसा द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि इतने महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले विधेयक को बिना व्यापक लोकतांत्रिक परामर्श के पारित करना उचित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि महिला संगठनों, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज से चर्चा के बिना इस तरह का फैसला लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

    रईसा ने कहा कि महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग पिछले 30 वर्षों के लंबे संघर्ष का परिणाम है, ऐसे में आरक्षण के क्रियान्वयन के साथ किसी भी प्रकार की शर्त जोड़ना स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि जनगणना और परिसीमन जैसी शर्तें लागू कर इस अधिकार को टालना न्याय में देरी के समान है।

    महिला संगठनों ने मांग की है कि 2023 के विधेयक से जनगणना और परिसीमन की अनिवार्य शर्तों को हटाया जाए, ताकि महिला आरक्षण को जल्द से जल्द लागू किया जा सके। साथ ही उन्होंने आरक्षण के भीतर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिए उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की भी मांग उठाई।

    संगठनों का कहना है कि बिना स्पष्टता के सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव महिलाओं के वास्तविक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के बजाय उसे टालने का माध्यम बन सकता है। इसे उन्होंने सत्ताधारी दलों की पितृसत्तात्मक सोच का उदाहरण बताया।

    इस मुद्दे पर उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि बिना बहस और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विधेयक पारित करने के प्रयास को तुरंत वापस लिया जाए और सभी हितधारकों के साथ व्यापक संवाद स्थापित किया जाए।

    रईसा ने इस दौरान महिला आंदोलन की वरिष्ठ नेता गीता मुखर्जी के संघर्ष को याद करते हुए कहा कि महिला आरक्षण का यह आंदोलन ऐतिहासिक रहा है और इसे किसी भी राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा।

    महिला संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे महिला सशक्तिकरण को केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक रूप में लागू होते देखना चाहते हैं। इसके लिए पारदर्शी, समयबद्ध और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

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