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    रैणी जंगल में दो हेक्टेयर वन भूमि से हरी लकड़ी चोरी,वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

    सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद हरकत में आया वन विभाग

    मिशनसच न्यूज, रैणी। अलवर जिले के रैणी क्षेत्र अंतर्गत गढ़ी सवाईराम वन नाका के अधीन भिखाहेड़ी गांव के जंगलों में बड़े पैमाने पर हरी लकड़ी की चोरी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। दो हेक्टेयर वन भूमि पर सैकड़ों हरे पेड़ों की कटाई कर लकड़ी को ट्रैक्टर-ट्रॉली और छोटे वाहनों के माध्यम से हरियाणा तक पहुंचाए जाने की जानकारी सामने आई है। हैरानी की बात यह है कि यह पूरी गतिविधि कई दिनों तक चलती रही, लेकिन वन विभाग को न तो समय पर भनक लगी और न ही कोई प्रभावी रोकथाम की गई।

    ग्रामीणों ने सोशल मीडिया पर उजागर किया मामला

    स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार भिखाहेड़ी गांव के जंगलों में अज्ञात लोग लगातार हरे पेड़ों को काटते रहे। दिन और रात में ट्रैक्टरों द्वारा लकड़ी की ढुलाई होती रही। जब स्थानीय लोगों ने जंगल में उजड़े क्षेत्र को देखा तो उन्होंने वीडियो और तस्वीरें बनाकर सोशल मीडिया पर साझा कर दीं। वीडियो वायरल होते ही मामला प्रशासनिक स्तर पर सुर्खियों में आ गया।

    सोशल मीडिया पर दबाव बढ़ने के बाद उप वन संरक्षक अलवर ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दो वन कर्मियों को निलंबित कर दिया। हालांकि स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए की गई है, जबकि असली दोषी अब भी कानून की पकड़ से बाहर हैं।

    दो हेक्टेयर जंगल साफ, पर पुलिस मुकदमा अब तक नहीं

    सबसे गंभीर पहलू यह है कि इतने बड़े स्तर पर वन संपदा की चोरी होने के बावजूद अब तक पुलिस में कोई ठोस आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं कराया गया है। वन विभाग द्वारा केवल अज्ञात लोगों के खिलाफ वन अधिनियम में औपचारिक मामला दर्ज कर खानापूर्ति कर ली गई है, लेकिन पुलिस जांच के दायरे में लाकर तस्करों पर सख्त कानूनी कार्रवाई से विभाग बचता नजर आ रहा है।

    स्थानीय नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि जब लाखों रुपये मूल्य के हरे पेड़ काटे गए, तो इसे केवल विभागीय लापरवाही मानकर छोड़ देना क्या उचित है? क्या इसके पीछे विभागीय मिलीभगत है या फिर निगरानी व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है?

    रेंजर और उच्च अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

    ग्रामीणों का आरोप है कि वन क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे घटनाक्रम से अनजान नहीं हो सकते। बिना स्थानीय जानकारी के इतने बड़े पैमाने पर लकड़ी की कटाई और परिवहन संभव नहीं है। यही कारण है कि केवल छोटे कर्मचारियों को निलंबित कर उच्च अधिकारियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।

    स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों ने भी इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते विभाग ने गश्त बढ़ाई होती और सूचना तंत्र मजबूत होता, तो जंगल की इतनी बड़ी क्षति नहीं होती।

    पर्यावरण को हुआ भारी नुकसान

    भिखाहेड़ी के जंगलों में हुई इस अवैध कटाई से केवल सरकारी राजस्व को नुकसान नहीं हुआ है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी प्रभावित हुआ है। दो हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हरे पेड़ स्थानीय वन्य जीवों का आश्रय थे। इनके कटने से जैव विविधता पर सीधा असर पड़ेगा। साथ ही भविष्य में मिट्टी कटाव, जलस्तर में गिरावट और तापमान वृद्धि जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।

    पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि ऐसे मामलों पर सख्ती नहीं की गई तो आने वाले समय में क्षेत्र के जंगल तेजी से समाप्त हो जाएंगे।

    स्थानीय लोगों की प्रमुख मांगें

    ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन के सामने प्रमुख मांगें रखी हैं—

    • लकड़ी चोरी में शामिल सभी आरोपियों की पहचान कर उनके खिलाफ पुलिस में आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए।

    • वन विभाग की गश्त व्यवस्था को मजबूत किया जाए।

    • केवल छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की भी जांच हो।

    • जंगल में हुए नुकसान का वैज्ञानिक आकलन कर पुनः वृक्षारोपण कराया जाए।

    स्थानीय लोगों का स्पष्ट कहना है कि यदि शीघ्र ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

    प्रशासन की परीक्षा की घड़ी

    यह मामला अब सिर्फ वन विभाग की लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की भी परीक्षा है। जब तक मुख्य तस्करों पर कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाता, तब तक निलंबन जैसी कार्रवाइयों को केवल औपचारिकता माना जाएगा।

    अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर पर्यावरणीय अपराध पर कठोर कदम उठाता है या यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह दबकर रह जाएगा।

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