विशेषज्ञों ने बाघ पुनर्बहाली, आवास संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन पर साझा किए अनुभव
अलवर। सरिस्का टाइगर रिजर्व में रविवार को “बाघ पुनर्स्थापन : अवसर एवं चुनौतियां” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा राजस्थान सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला में देशभर के वरिष्ठ वन अधिकारियों, वैज्ञानिकों, संरक्षण विशेषज्ञों एवं विभिन्न टाइगर रिजर्व के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
कार्यशाला का उद्घाटन केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री ने किया। इस अवसर पर राजस्थान सरकार के वन मंत्री, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी तथा इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (आईबीसीए) के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।
कार्यशाला में बाघ संरक्षण, बाघ पुनर्स्थापन तथा कम बाघ घनत्व वाले टाइगर रिजर्व में बाघों की पुनर्बहाली के लिए अपनाई जा रही वैज्ञानिक रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने आवास सुधार, शिकार आधार को सुदृढ़ करने, वन्यजीव गलियारों (कॉरिडोर) के संरक्षण, लैंडस्केप कनेक्टिविटी, बाघ अनुपूरण (Supplementation) तथा पुनर्स्थापन (Re-introduction) जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने अनुभव साझा किए। साथ ही भविष्य में बाघ संरक्षण को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए नई कार्ययोजनाओं पर भी मंथन किया गया।
इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री ने भारत में बाघों के सक्रिय प्रबंधन के लिए तैयार रोडमैप, बाघ पुनर्स्थापन एवं पुनर्बहाली पर आधारित पुस्तक तथा प्रोजेक्ट चीता की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट का विमोचन किया। इन प्रकाशनों में बाघ संरक्षण, वैज्ञानिक हस्तक्षेपों, पुनर्स्थापन कार्यक्रमों की उपलब्धियों तथा भविष्य की रणनीतियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया।
कार्यशाला में बताया गया कि भारत आज विश्व के लगभग 70 प्रतिशत जंगली बाघों का संरक्षण कर रहा है। देश में वर्तमान में 58 टाइगर रिजर्व हैं, जिनमें करीब 3,682 बाघ पाए जाते हैं। पिछले एक दशक में टाइगर रिजर्व की संख्या और संरक्षित क्षेत्रों का दायरा लगातार बढ़ा है। हालांकि कई टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या संतोषजनक है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में अब भी आवास विखंडन, कम शिकार आधार तथा बाघों की सीमित संख्या जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों ने सरिस्का और पन्ना टाइगर रिजर्व के सफल बाघ पुनर्स्थापन मॉडल को देश के लिए प्रेरणादायक बताया। वर्ष 2008 में सरिस्का में शुरू हुए वैज्ञानिक बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रम तथा पन्ना टाइगर रिजर्व की सफलता ने भारत को इस क्षेत्र में वैश्विक पहचान दिलाई है।
कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में वन्यजीव स्थानांतरण, स्रोत-सिंक (Source-Sink) गतिशीलता, निगरानी प्रणाली, सक्रिय प्रबंधन रणनीतियों तथा बाघ-विहीन टाइगर रिजर्व में पुनर्बहाली की योजनाओं पर विस्तृत चर्चा हुई।
कार्यशाला के समापन पर विशेषज्ञों ने कहा कि इस राष्ट्रीय मंच पर हुए विचार-विमर्श और साझा अनुभव भविष्य में देश के बाघ संरक्षण कार्यक्रमों को और अधिक वैज्ञानिक, प्रभावी एवं परिणामोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। साथ ही वन विभाग, वैज्ञानिक संस्थानों एवं संरक्षण एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को नई मजबूती मिलेगी।
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