किशनगढ़ बास के सिंधी समाज में शोक की लहर, ‘सचो सतराम’ के संदेश को बताया अमर
किशनगढ़ बास। हिन्द सिंध के संतराम धाम पूज्य राहड़की साहिब के नवम पीठाधीश्वर साईं साधराम साहिब के ब्रह्मलीन होने की खबर से किशनगढ़ बास सहित पूरे सिंधी समाज में गहरा शोक व्याप्त हो गया। शोक स्वरूप रविवार को समाज के लोगों ने स्वेच्छा से अपने प्रतिष्ठान बंद रखे तथा संतकवर राम सिंधी गुरुद्वारा में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में पहुंचकर नम आंखों से अपने गुरु को श्रद्धांजलि अर्पित की। सभा में महिलाओं और पुरुषों ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत संत की आत्मशांति के लिए प्रार्थना की।
25 अक्टूबर 1963 को रहारकी साहिब, सिंध (पाकिस्तान) में जन्मे साईं साधराम साहिब बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और आध्यात्मिक संस्कारों से संपन्न थे। वे परम पूज्य संत साईं भगवानदास साहिब के पुत्र और महान सूफी संत शहंशाह साईं सतराम दास साहिब की परंपरा के उत्तराधिकारी थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट क्षेत्र में शानदार करियर की शुरुआत की, लेकिन तत्कालीन गद्दीनशीन संत साईं कन्हैयालाल साहिब की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए सांसारिक जीवन का त्याग कर आध्यात्मिक मार्ग को अपनाया।
साईं कन्हैयालाल साहिब के ब्रह्मलीन होने के बाद उन्हें रहारकी साहिब दरबार का ‘हाज़िर स्वरूप’ घोषित किया गया। इसके बाद उन्होंने विश्वभर में फैले श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन किया। सफेद वस्त्रधारी, सौम्य और शांत स्वभाव के साईं साधराम साहिब की पहचान उनकी सहज मुस्कान और मधुर वाणी से थी। भक्तों का मानना था कि उनके दर्शन मात्र से मानसिक तनाव दूर हो जाता था और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता था।
देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु उनके सत्संग और आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचते थे। पाकिस्तान में रहते हुए भी उन्होंने भारत, दुबई, अमेरिका सहित कई देशों में सत्संग यात्राएं कीं। करीब दो वर्ष पूर्व वे किशनगढ़ बास भी आए थे, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उनका आशीर्वाद प्राप्त किया था।
समाज के लोगों ने बताया कि विभाजन के बाद बिखरे सिंधी समाज को एकजुट रखने, सिंधी भाषा और सूफी परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में साईं साधराम साहिब की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होंने ‘मानव सेवा ही सबसे बड़ी ईश्वर पूजा’ के सिद्धांत को जीवनभर आत्मसात किया। उनके मार्गदर्शन में रहारकी साहिब सहित विभिन्न आश्रमों में 24 घंटे लंगर, निःशुल्क चिकित्सा शिविर और जरूरतमंदों की सहायता के कार्य निरंतर चलते रहे।
उन्होंने युवाओं को नशामुक्ति, शिक्षा और समाजसेवा के प्रति प्रेरित किया। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और तनाव से जूझ रहे लोगों को उन्होंने ‘नाम सिमरण’ और ध्यान के माध्यम से मानसिक शांति का मार्ग दिखाया।
श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि साईं साधराम साहिब का ब्रह्मलीन होना केवल सिंधी समाज ही नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए अपूरणीय क्षति है। उनकी शिक्षाएं, सेवा-भाव और ‘सचो सतराम’ का संदेश सदैव मानवता को प्रेरणा देता रहेगा।
सभा में समाज के मुखी गोकुल दास, बाबा बाबूलाल, रूपचंद बतरा सहित बड़ी संख्या में समाजबंधु उपस्थित रहे।
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