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    स्वयंसिद्धा आश्रम से मिल रहा सहारा, राजस्थान में बुजुर्गों को सम्मान

    स्वयंसिद्धा आश्रम योजना का विस्तार, जरूरतमंदों को सम्मानजनक जीवन

    जयपुर। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के संवेदनशील नेतृत्व में राजस्थान सरकार द्वारा शुरू की गई स्वयंसिद्धा आश्रम योजना समाज के कमजोर और उपेक्षित वर्गों के लिए एक मजबूत सहारा बनकर उभरी है। यह योजना बुजुर्गों और असहाय नागरिकों को जीवन के अंतिम पड़ाव में सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।

    राज्य सरकार ने इस योजना को विशेष प्राथमिकता देते हुए बजट वर्ष 2024-25 में संभाग स्तर पर 50-50 क्षमता के आश्रम स्थापित करने की घोषणा की थी। इसके बाद बजट 2025-26 में इसे और विस्तार देते हुए 10 नए जिलों को शामिल किया गया, जिससे योजना का दायरा और व्यापक हो गया है।

    वर्तमान में राजस्थान के 17 जिलों—अजमेर, बालोतरा, ब्यावर, भरतपुर, बीकानेर, चुरू, डीग, डीडवाना-कुचामन, जयपुर, जोधपुर, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड़, कोटा, फलौदी, सलूम्बर, सीकर और उदयपुर—में स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से स्वयंसिद्धा आश्रमों का संचालन किया जा रहा है। यहां बुजुर्गों को परिवार जैसा वातावरण प्रदान किया जाता है।

    इस योजना का उद्देश्य केवल आश्रय उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि बुजुर्गों को गरिमा, सुरक्षा और सक्रिय जीवन देना है। आश्रमों में रहने वाले लोगों के लिए आवास, पौष्टिक भोजन, वस्त्र, चिकित्सा सुविधा, स्वास्थ्य सेवाएं, मनोरंजन और सामाजिक गतिविधियों की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।

    स्वयंसिद्धा आश्रम में प्रवेश के लिए किसी भी राज्य के वरिष्ठ नागरिक और असहाय/निराश्रित व्यक्ति पात्र हैं। पुरुषों के लिए न्यूनतम आयु 58 वर्ष और महिलाओं के लिए 55 वर्ष निर्धारित की गई है। वहीं, ऐसे व्यक्ति जो संतानहीन हैं, परिवार से प्रताड़ित हैं या जिनके पास कोई सहारा नहीं है, उन्हें भी योजना का लाभ दिया जा रहा है।

    आश्रम में प्रवेश के लिए इच्छुक व्यक्ति जिला स्तर पर आवेदन कर सकते हैं। आवेदन की जांच जिला कलेक्टर, अतिरिक्त जिला कलेक्टर या संबंधित अधिकारी द्वारा की जाती है। अनुमोदन के बाद ही प्रवेश दिया जाता है। इस प्रक्रिया में जाति, धर्म या किसी भी सामाजिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता, जिससे योजना की पारदर्शिता बनी रहती है।

    योजना के तहत प्रत्येक आवासी को प्रतिमाह 3250 रुपये का मैस भत्ता दिया जाता है। इसके अलावा हर पांच वर्ष में 10,000 रुपये का अतिरिक्त अनावर्तक व्यय भी प्रदान किया जाता है। आश्रमों के संचालन के लिए भवन किराया और कर्मचारियों के भुगतान की व्यवस्था भी तय दिशा-निर्देशों के अनुसार की गई है।

    इस योजना के माध्यम से वर्तमान में 483 से अधिक बुजुर्ग और असहाय नागरिक लाभान्वित हो रहे हैं। यह आंकड़ा उन जीवनों में आए सकारात्मक बदलाव का प्रतीक है, जहां अब लोगों को सुरक्षा, सम्मान और अपनापन मिल रहा है।

    स्वयंसिद्धा आश्रम योजना न केवल सामाजिक सुरक्षा को मजबूत कर रही है, बल्कि मानवीय मूल्यों को भी नई दिशा दे रही है। यह योजना ऐसे समाज की परिकल्पना को साकार करती है, जहां हर व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार मिले।

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