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    Dewas: कलेक्टर कार्यालय में छत से कूदने लगी महिला, पुलिस ने बचाया

    देवास। देवास जिला कलेक्टर कार्यालय में मंगलवार को जनसुनवाई के दौरान उस समय हड़कंप मच गया, जब हाटपिपलिया से आए एक दंपति में महिला ने कलेक्टर कार्यालय की छत से कूदने की कोशिश की। वजह थी- उनकी वर्षों पुरानी पट्टे की जमीन पर कथित रूप से फर्जी तरीके से किसी अन्य को कब्जा दे दिया जाना और बार-बार शिकायतों के बावजूद सुनवाई न होना।
     
    महिला की इस कोशिश को मौके पर मौजूद मीडिया कर्मियों और पुलिसकर्मियों ने समय रहते विफल कर दिया, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया। बाद में, कलेक्टर ऋतुराज सिंह ने मामले को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र समाधान का आश्वासन दिया।

    ‘पट्टे की जमीन फर्जी तरीके से छीन ली गई’

    धर्मेंद्र बागरी और उनकी पत्नी आशा बागरी, हाटपिपलिया तहसील से अपनी शिकायत लेकर जनसुनवाई में पहुंचे थे। दोनों का आरोप है कि उनकी पट्टे की भूमि किसी अन्य को फर्जी तरीके से आवंटित कर दी गई, जबकि वे कई महीनों से न्याय की गुहार लगा रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास वर्ष 1960 में जारी पट्टे से संबंधित सभी दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन अब तक उन्हें कोई स्पष्ट जवाब या राहत नहीं दी गई।
     
    कलेक्टर कार्यालय की छत से कूदने लगी महिला, मचा हड़कंप

    जनसुनवाई में जब कलेक्टर ने दस्तावेज लेकर उन्हें रवाना कर दिया और कोई स्पष्ट निर्णय नहीं दिया। तब महिला आशा बागरी आक्रोशित होकर कलेक्टर कार्यालय की छत पर जा चढ़ीं और कूदने का प्रयास करने लगीं। मौके पर मौजूद मीडिया के साथी और पुलिसकर्मियों ने तुरंत हरकत में आते हुए उन्हें रोका और समझा-बुझाकर नीचे लाए।
     
    ‘सुनवाई नहीं हुई तो करेंगे आत्मदाह’

    नीचे लाए जाने के बाद महिला और उनके पति ने चेतावनी दी कि अगर इस मामले में जल्द सुनवाई और न्याय नहीं हुआ तो वे आत्मदाह जैसा कदम उठाने को मजबूर होंगे। धर्मेंद्र बागरी ने बताया कि उनकी जमीन सर्वे नंबर 1037/1 रकबा 1.8090 हेक्टेयर है, जिससे उनका नाम त्रुटिवश हटा दिया गया है। इस संबंध में उन्होंने सीएम हेल्पलाइन और टीएल बैठक में भी शिकायत दर्ज करवाई है, लेकिन कोई समाधान नहीं मिला।

    कलेक्टर ने माना मामला जटिल, शीघ्र समाधान का भरोसा

    कलेक्टर ऋतुराज सिंह ने मीडिया से बातचीत में स्वीकार किया कि यह मामला बहुत पुराना और जटिल है। उन्होंने बताया कि आवेदक को करीब 1960 में पट्टा दिया गया था, लेकिन वह उस भूमि पर कभी काबिज नहीं रहा। उसी खसरा नंबर पर 30 साल पहले आईटीआई का निर्माण हो चुका है। उन्होंने आगे कहा कि इस विषय पर तहसीलदार की जांच के बाद प्रकरण एसडीएम को सौंपा गया है और फिलहाल सुनवाई प्रक्रिया में है। हम इस मामले में समाधान के लिए कानूनी और व्यवहारिक दोनों दृष्टिकोण से विचार कर रहे हैं।

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