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    किसानों का आक्रोश, काम पैसे वालों का–नाम किसानों का : रामपाल जाट

    कृषि प्रधान भारत की भावना से दूर दिखा केंद्रीय बजट, किसान महापंचायत की कड़ी प्रतिक्रिया

    मिशनसच न्यूज, जयपुर। केंद्रीय बजट पर देश के किसानों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने कहा कि केंद्र का बजट कृषि प्रधान भारत की अनुभूति से मेल नहीं खाता। उन्होंने आरोप लगाया कि इस बजट के केंद्र में कृषि और किसान नहीं, बल्कि पूंजीपतियों की पूंजी बढ़ाने की सोच दिखाई देती है। यह बजट ‘ऋण मुक्त किसान, समृद्ध हिंदुस्तान’ की भावना से कोसों दूर है।

    रामपाल जाट ने कहा कि वैश्विक स्तर पर ट्रंप टैरिफ जैसी नीतियों से उत्पन्न अस्थिरता के दौर में ग्राम उद्योगों से परिपूर्ण स्वायत्त गांवों की रचना पर कोई ठोस चर्चा नहीं की गई। प्रत्येक गांव को औद्योगिक क्षेत्र घोषित कर युवाओं के भटकाव, तनाव और बेरोजगारी को दूर करने की दिशा में भी सरकार ने कोई पहल नहीं की।

    उन्होंने कहा कि स्वाभिमानी भारत के निर्माण के लिए गरीब को आत्मनिर्भर बनाने की बजाय पुरानी ‘गरीब को छप्पर’ जैसी योजनाओं को ही दोहराया गया है। मांग–आपूर्ति आधारित अर्थचक्र को गति देने के लिए अधिकतम उपभोक्ताओं की जेब में पैसा पहुंचाने की नीति पर भी कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया। इसी कारण कृषि उपज के लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने हेतु न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी का कानून बनाने की घोषणा नहीं की गई।

    रामपाल जाट ने कहा कि यदि कुल जनसंख्या के 5 प्रतिशत लोगों की जेब में पैसा आने से अर्थव्यवस्था चल सकती है, तो 75 प्रतिशत लोगों की जेब में पैसा आने से अर्थव्यवस्था को पंख लग सकते हैं। ‘विश्व असमानता प्रतिवेदन 2026’ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि बढ़ती आय विषमता अशांति, अपराध और अराजकता को बढ़ावा देती है, लेकिन इसे रोकने के लिए घरेलू मांग बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया गया।

    उन्होंने आरोप लगाया कि निजी निवेश की नीतियां धनपतियों के धन को बढ़ाती हैं और गरीबों की जेब पर कैंची चलाती हैं। शेयर बाजार की ओर पूंजी प्रवाह से बचत घटती है और विषमता बढ़ती है। 52 प्रतिशत जीविकोपार्जन उपलब्ध कराने वाले कृषि क्षेत्र को इस बजट में उपेक्षित किया गया है, जिससे कृषि और उससे जुड़े धंधों में लगे 75 प्रतिशत लोग हतप्रभ हैं।

    किसान नेता ने कहा कि खादी, हथकरघा और हस्तशिल्प के लिए ‘महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल’, पशुपालन चिकित्सकों की नियुक्ति और फसल विविधीकरण जैसी घोषणाएं तो की गईं, लेकिन इनके लिए मात्र 350 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया। कुल 53.47 लाख करोड़ रुपये के बजट में कृषि क्षेत्र के लिए सिर्फ 2.84 लाख करोड़ रुपये यानी 5.31 प्रतिशत का ही प्रावधान है, जबकि ग्रामीण और किसान आबादी की हिस्सेदारी लगभग 75 प्रतिशत है।

    अंत में रामपाल जाट ने कहा कि विकसित भारत की मौजूदा अवधारणा बिना दिशा के यात्रा जैसी है, जिसका लाभ पूंजीपतियों को मिलता है। सही दिशा के बिना देश की सही दशा संभव नहीं है।

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