अरावली पर्वतमाला आज गंभीर संकट में है। जलपुरुष राजेन्द्र सिंह ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वर्तमान कानून और प्रशासनिक व्यवस्था इसके संरक्षण में नाकाम है। क्या संवैधानिक त्याज्यता का सिद्धांत ही इसका अंतिम समाधान है? पढ़ें पूरी रिपोर्ट और जानें सच्चाई।
वर्तमान विधिक रूप एवं प्रशासनिक व्यवस्था से अरावली का पारिस्थितिकी-पर्यावरण संरक्षण सम्भव नहीं है। यह वाद-विवाद की प्रक्रिया से जटिलताओं को बढ़ायेगा। प्रशासनिक एवं विशेषज्ञ व्यक्ति जिस शक्ति के अधीन काम करते हु, वे विधिक कार्रवाइयों को बार-बार समितियां बना कर समस्या का समाधान नहीं करती हैं; बल्कि उसे और अधिक जटिल बना रही हैं। यह प्रक्रिया सर्वानुमति का निर्धारण करने के बजाय उसे पूर्वधारित करती रहेगी। इसे एक बार अग्रिम रूप में और सार्वभौमिक रूप में तय किया जाना संवैधानिक त्याज्यता से ही सम्भव होगा।
संवैधानिक रूप से संरक्षित हित को कानूनी रूप से उजागर करने से पहले उसकी “त्याज्यता” का निर्णय किया जाए। यह निर्णय पूर्व में, सार्वभौमिक रूप से और बिना किसी प्रत्यायोजन के, स्वयं संवैधानिक स्तर पर होना चाहिए। इसी विचार को “संवैधानिक त्याज्यता का सिद्धांत” कहा जाता है। इसका सार यह है कि यदि संवैधानिक संरक्षण को केवल परिणाम के रूप में नहीं, बल्कि एक वास्तविक और प्रभावी वचन के रूप में बनाए रखना है, तो इस प्रकार का पूर्व और अनिवार्य संवैधानिक निर्धारण अपरिहार्य है।
पूर्व निर्धारण के बिना दोष और हानि की समीक्षा करके निवारण नहीं होता है। अरावली सतत् खनन के कुप्रभाव का निर्धारण करके उसे ही संवैधानिक अनुमति नहीं देनी चाहिए। ऐसा उच्चतम न्यायालय ने अपने 2014 से पूर्व के निर्णयों के द्वारा किया है। पहले केवल अरावली संरक्षण को ही अनुमति दी गई थी। अभी जो उच्चतम न्यायालय में प्रक्रिया चालू है, इससे संवैधानिक विचलन होगा। इसे रोकने हेतु परिणामों का पूर्व निर्धारण करके ही संवैधानिक त्याज्यता के सिद्धान्त को अपनाना होगा।
अरावली को पत्थरों का ढेर नहीं मानें। भारत की विरासत, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी का आधार मानें। जलवायु परिवर्तन अनुकूलन बनाये रखने के लिए अरावली को भारत राष्ट्र ही नहीं, सार्वभौमिक मानें। यह अप्रत्यायोज्य संवैधानिक निर्धारण एवं संवैधानिक प्रतिबद्धता के लिए आवश्यक है। उक्त को अरावली में अपरिहार्य और एकमात्र व्यावहारिक निहितार्थ मानना ही संवैधानिक त्याज्यता के सिद्धान्त का पालन है।
संवैधानिक सिद्धान्त है, कानून बनने से पहले ही, शासन को कानूनी क्षति से रोकना। किसी कारण ऐसा नहीं किया हो तो ऐसी विधिक रूप को संवैधानिक अनुमति नहीं देना चाहिए। जहां पहली बार वैध रूप में ऐसा हुआ है, उस बिन्दु पर संवैधानिक संरक्षण को हटाया या समिति या अस्वीकार किया जाना ही संवैधानिक त्याज्यता सिद्धान्त है।
संवैधानिक सवाल को कभी भी प्रत्यायोजित, अनुभव जन्य, वाद-विवाद की कानूनी प्रक्रिया पर नहीं छोड़ना चाहिए। अरावली की परिभाषा का प्रश्न विशेषज्ञ, प्रशासनिक और विधिक रूप में समाधान सम्भव नहीं है। यह सवाल सदैव उन्हीं शक्तियों के अन्दर उठता- घुमड़ता रह कर जटिल बनता जायेगा। अतः अरावली में सतत् खनन से जलवायु परिवर्तन संकट बढ़ेगा।
खनन में अरावली कटकर गैप बना कर भारत की राजधानी और पूर्वी भाग के लिए रेगिस्तान बढ़ाकर वर्षा-चक्र को बदलेगा। इससे होने वाली क्षति की पूर्ति नहीं हो सकती। अतः अभी कुछ ही लाभ के लिए सम्पूर्ण भारत के शुभ को नष्ट करना उचित नहीं है। यह निर्णय भारत की संवैधानिक पीठ ले सकती है। ऐसा निर्णय संवैधानिक त्याज्यता के सिद्धान्त द्वारा ही किया जा सकता है। यह पूर्वधारित सार्वभैमिक होगा।
संवैधानिक प्रतिबद्धता को वास्तव में प्रभावी बनाना है और उसे साधारण कानूनों के अधीन नहीं होने देना है, तो यह आवश्यक है कि किसी भी संवैधानिक रूप से संरक्षित हित को प्रभावित करने की संभावना पैदा होने से पहले ही उसके बारे में स्पष्ट निर्णय लिया जाए। दूसरे शब्दों में, जैसे ही कोई ऐसा कानूनी प्रावधान बनाया जाता है जो किसी संरक्षित हित को उजागर कर सकता है, उसी क्षण यह तय होना चाहिए कि क्या उस हित को सीमित, हटाया या अस्वीकार किया जा सकता है। यह प्रश्न मूलतः संवैधानिक है, इसलिए इसे प्रशासनिक प्रक्रियाओं, अनुभवजन्य आकलनों या बाद की न्यायिक कार्यवाहियों पर नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि वे सभी उसी संवैधानिक ढांचे के भीतर काम करती हैं जिसकी वैधता स्वयं इसी प्रश्न पर निर्भर करती है।
इस प्रकार का पूर्वनिर्णय नहीं किया जाता, तो वही प्रश्न बार-बार साधारण कानूनी कार्रवाइयों में उभरता रहता है। ये कार्रवाइयाँ स्वयं उस अनुमति को तय नहीं करतीं, बल्कि उसे पहले से मानकर चलती हैं। परिणामस्वरूप, संवैधानिक स्पष्टता की जगह एक प्रकार का विचलन उत्पन्न होता है, जहाँ मूल प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है और उसके प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए लगातार नए उपाय किए जाते हैं। इस स्थिति में समस्या बाद में होने वाली हानि या उसके समाधान में नहीं होती, बल्कि उस प्रारंभिक स्तर पर होती है जहाँ बिना संवैधानिक आधार तय किए ही किसी हित को जोखिम के लिए खोल दिया जाता है।
अरावली संरक्षण अपरिहार्य है। यह पूरे भारत की जलवायु का प्रश्न है। प्राचीनतम विरासत का प्रश्न है। इसका समाधान समितियां या विधिक एवं परिभाषा की स्पष्टता में निहित नहीं है; यह तो सम्पूर्ण भारत हेतु संवैधानिक निर्धारण का प्रश्न है। अतः अरावली संरक्षण हेतु हमारे सम्माननीय उच्चतम न्यायालय को संवैधानिक त्याज्यता का सिद्धान्त अपनाना चाहिए।
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