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    Homeदुनियाजापान में भीषण आग पर 11 दिन बाद काबू, राहत की सांस

    जापान में भीषण आग पर 11 दिन बाद काबू, राहत की सांस

    टोक्यो। जापान के उत्तर-पूर्वी प्रांत इवाते के ओत्सुची शहर में करीब 11 दिनों तक तांडव मचाने वाली भीषण वन्य अग्नि (Forest Fire) पर आखिरकार पूरी तरह काबू पा लिया गया है। स्थानीय प्रशासन और फायर एजेंसी द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस भयावह आग ने देखते ही देखते 1,633 हेक्टेयर वन क्षेत्र को अपनी चपेट में लेकर खाक कर दिया। जापानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पिछले 30 वर्षों में देश की दूसरी सबसे बड़ी वनाग्नि की घटना है, जिसने न केवल पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया, बल्कि आठ इमारतों को भी पूरी तरह नष्ट कर दिया।

    प्रशासनिक मुस्तैदी और भारी बारिश से थमी आग की लपटें

    ओत्सुची के मेयर कोजो हिरानो ने एक प्रेस वार्ता में बताया कि आग पर नियंत्रण पाने में हवाई और जमीनी स्तर पर किए गए व्यापक फायरफाइटिंग ऑपरेशंस के साथ-साथ प्रकृति का भी बड़ा योगदान रहा। क्षेत्र में हुई भारी बारिश ने आग को बुझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे स्थिति में तेजी से सुधार आया। इस सप्ताह की शुरुआत में जोखिम वाले इलाकों से लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए जारी किए गए 'निकासी आदेश' भी अब वापस ले लिए गए हैं। हालांकि, मेयर ने चेतावनी दी है कि अभी भी पूर्ण सतर्कता बरतने की आवश्यकता है, क्योंकि सूखे पत्तों और लकड़ियों के नीचे दबे अंगारे फिर से सुलग सकते हैं।

    जापान में बढ़ती वनाग्नि और ऐतिहासिक संदर्भ

    आंकड़ों पर नजर डालें तो जापान में जंगल की आग की घटनाएं समय के साथ और विकराल होती जा रही हैं। पिछले साल भी इवाते प्रीफेक्चर के ओफुनातो में लगी आग ने 2,600 हेक्टेयर क्षेत्र को जला दिया था। इससे पहले साल 1975 में होक्काइडो के कुशिरो में 2,700 हेक्टेयर जमीन आग की भेंट चढ़ी थी। ओत्सुची की हालिया घटना ने 22 अप्रैल से शुरू होकर 2 मई 2026 तक तबाही मचाई, जो आधुनिक जापान के इतिहास में वनों के विनाश की एक बड़ी मिसाल बन गई है।

    जलवायु परिवर्तन और सूखे वसंत का दोहरा खतरा

    वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने जापान के जंगलों में बढ़ती आग की इन घटनाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को मुख्य कारण माना है। विशेषज्ञों के अनुसार, जापान में मार्च से मई के बीच वसंत ऋतु के दौरान हवाएं काफी शुष्क होती हैं और बारिश कम होती है, जिससे जंगलों में सूखी लकड़ियों और पुराने पत्तों का ढेर 'बारूद' की तरह काम करता है। 50-60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली तेज हवाओं ने इस आग को नियंत्रित करना नामुमकिन बना दिया था। ड्राई विंटर्स (शुष्क शीतकाल) की बढ़ती अवधि ने वनों में नमी कम कर दी है, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति का खतरा और बढ़ गया है।

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