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    अलवर: यूआईटी का अंधेर नगरी जैसा हाल, 30 साल से किसानों की जमीन, मुआवजा और भविष्य सब अधर में

    अलवर में साकेत नगर, रोहिणी नगर और एमआईए योजनाओं की 1190 बीघा जमीन आज भी कानूनी उलझनों में; न अधिग्रहण पूरा हुआ, न मुआवजा मिला, न डिनोटिफिकेशन का फैसला हुआ

     

    विजय यादव
    विजय यादव

    विजय यादव, मिशन सच, अलवर

    तीन दशक पहले शहर के व्यवस्थित विस्तार के नाम पर शुरू हुई तीन आवासीय योजनाएं आज भी सरकारी लापरवाही और नीतिगत अनिर्णय की मिसाल बनी हुई हैं। नगर विकास न्यास (यूआईटी) ने 1995-96 में साकेत नगर, रोहिणी नगर और एमआईए के लिए करीब 1190 बीघा जमीन अधिग्रहण के दायरे में ली थी, जिसके एवज में लगभग 30.36 करोड़ रुपए मुआवजा प्रस्तावित किया गया था। लेकिन आज, तीस साल बाद भी न योजनाएं पूरी तरह ज़मीन पर उतर सकीं, न प्रभावित किसानों को न्याय मिला और न ही यह तय हो सका कि आखिर इन ज़मीनों का भविष्य क्या है।

    इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि खुद यूआईटी ने वर्ष 2000 में साकेत नगर योजना को रद्द करने यानी डिनोटिफाई करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। बोर्ड ने प्रस्ताव पारित किया, सरकार को पत्र लिखे गए, जनता से आपत्तियां मांगी गईं लेकिन अंतिम आदेश आज तक जारी नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि योजना न तो लागू हो सकी, न औपचारिक रूप से खत्म और इसी शून्य में किसानों की तीन पीढ़ियां उलझी रह गईं।

    आंकड़ों में योजनाएं: कितनी जमीन, कितना मुआवजा
    योजना                                  अवार्ड भूमि                         प्रस्तावित मुआवजा
    साकेत नगर                            286 बीघा                          ₹7,53,06,900

    एमआईए-150                        509 बीघा 05 बिस्वा              ₹12,00,48,886

    रोहिणी नगर                            395 बीघा 05 बिस्वा              ₹10,82,33,951

    कुल करीब 1190 बीघा, करीब ₹30.36 करोड़

    जब यूआईटी ने खुद कहा – योजना अव्यावहारिक है

    सरकारी रिकॉर्ड इस बात के गवाह हैं कि 10 अगस्त 2000 को यूआईटी बोर्ड की बैठक में साकेत नगर योजना को भूमि अवाप्ति अधिनियम की धारा-48 के तहत डिनोटिफाई करने का निर्णय लिया गया था। इसके बाद 12 नवंबर 2000 को नगरीय विकास विभाग को भेजे पत्र में यूआईटी ने स्पष्ट रूप से लिखा कि इस योजना का वित्तीय भार बहुत अधिक है, जबकि क्षेत्र में आवासीय भूखंडों की मांग तुलनात्मक रूप से कम है। यूआईटी ने यह भी रेखांकित किया कि आसपास सूर्य नगर, अंबेडकर नगर और वैशाली नगर जैसी योजनाएं पहले से मौजूद हैं, इसलिए नई योजना की जरूरत नहीं।

    यूआईटी ने सार्वजनिक विज्ञप्ति जारी कर आपत्तियां भी आमंत्रित की, और 12 अप्रैल 2001 को राज्य सरकार को दोबारा पत्र भेजकर कार्रवाई पूरी करने का अनुरोध किया। 5 दिसंबर 2001 को नगरीय विकास विभाग ने खातेदारों से यह अंडरटेकिंग लेने के निर्देश भी दिए कि यदि भूमि अधिग्रहण से मुक्त की जाती है तो वे भविष्य में हर्जाने का दावा नहीं करेंगे। लेकिन इसके बाद प्रक्रिया वहीं ठहर गई अंतिम आदेश कभी जारी नहीं हुआ।

    15% बनाम 25% विकसित भूमि: विवाद की जड़

    मुआवजे से इतर, इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू विकसित भूमि के हिस्से को लेकर है। प्रभावित किसान वर्षों से 25 प्रतिशत विकसित भूमि की मांग कर रहे हैं, उनका तर्क है कि उच्चतम न्यायालय के फैसलों के अनुरूप उन्हें यह अधिकार मिलना ही चाहिए। दूसरी ओर, यूआईटी लंबे समय तक केवल 15 प्रतिशत विकसित भूमि देने के पक्ष में रहा। किसान संगठनों का सवाल है कि जब समान परिस्थितियों में अन्य योजनाओं में 25 प्रतिशत विकसित भूमि दी गई, तो यहां भेदभाव क्यों बरता गया।

    अनिश्चितता की कीमत: भू माफियाओं को मौका, किसान असहाय

    तीन दशक की इस कानूनी उलझन ने सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं किसानों को पहुंचाया, जिनकी जमीन अधिग्रहण के दायरे में थीं। वे न अपनी जमीन का स्वतंत्र उपयोग कर सके, न बाजार दर पर बेच पाए। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि इसी अनिश्चितता का लाभ उठाकर भूमाफियाओं ने किसानों से औने-पौने दाम पर जमीनें खरीदीं, विवादित भूमि पर कब्जे किए और कई जगह अवैध कॉलोनियां बसाने की कोशिशें भी हुईं।

    प्रभावित किसानों के अनुसार, तीन दशक में उनकी पीढ़ियां बदल गईं । किसी की बेटी की शादी के लिए ज़मीन नहीं बिक सकी, कोई बैंक से ऋण नहीं ले सका, तो कई परिवार अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते थक चुके हैं। उनका सीधा सवाल है , यदि योजनाएं लागू करनी ही थीं, तो समय पर अधिग्रहण और मुआवजा क्यों नहीं दिया गया? और यदि योजनाएं व्यावहारिक नहीं थीं, तो डिनोटिफिकेशन की प्रक्रिया अधूरी क्यों छोड़ दी गई?

    विशेषज्ञ की राय: कानूनन अधिग्रहण स्वतः निरस्त माना जाना चाहिए

    राजेश सिंघल
    राजेश सिंघल

    भूमि मामलों के जानकार राजेश सिंघल का कहना है कि यदि किसी भूमि का अधिग्रहण करने के बाद संबंधित एजेंसी न तो विधिवत कब्जा लेती है और न ही प्रभावित किसानों को मुआवजा देती है, तो ऐसे मामलों में अधिग्रहण स्वतः ही निरस्त माना जाना चाहिए। सिंघल बताते हैं कि इन योजनाओं में तो यूआईटी ने स्वयं लिखित रूप में स्वीकार किया है कि उसे ज़मीन की आवश्यकता नहीं है और धन की भी कमी है। भूमि अधिग्रहण से जुड़े कानूनी प्रावधानों के अनुसार, यदि निर्धारित अवधि में अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी न हो और भूमि का उपयोग भी न हो, तो अधिग्रहण निरस्त माना जाएगा। उनका कहना है कि इस मामले में किसान पीड़ित पक्ष हैं और उन्हें राज्य सरकार से उचित मुआवजा मिलना चाहिए, लेकिन तीन दशक बाद भी इन योजनाओं का कोई ठोस भविष्य तय नहीं हो पाया है।

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