More
    Homeस्वास्थ्यक्या जन्म से ही डायबिटीज और मानसिक रोगों के खतरे के साथ...

    क्या जन्म से ही डायबिटीज और मानसिक रोगों के खतरे के साथ पैदा हो रहा है आपका बच्चा? जानें रिपोर्ट

    बदलते दौर में दुनिया भर के स्वास्थ्य और बाल रोग विशेषज्ञों ने एक बेहद ही चौंकाने वाले और चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा किया है। आजकल पहले की तुलना में 'जायंट बेबी' यानी सामान्य से अत्यधिक भारी बच्चों के जन्म लेने की दर में भारी इजाफा देखा जा रहा है। इसके साथ ही बेहद कम उम्र में ही बच्चों और युवाओं में हृदय रोग (हार्ट अटैक), टाइप-2 डायबिटीज, उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) और गंभीर मानसिक विकार तेजी से बढ़ रहे हैं।

    चिकित्सा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की संयुक्त टीमों द्वारा किए गए हालिया वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह साबित हुआ है कि इन गंभीर और जानलेवा बीमारियों का सीधा संबंध गर्भावस्था के दौरान मां द्वारा बरती गई लापरवाहियों और अनियंत्रित जीवनशैली से है। प्रेग्नेंसी के दौरान एक महिला जो कुछ भी खाती-पीती है, उसका सीधा असर केवल गर्भ में पल रहे शिशु के तत्कालीन स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि उसके आने वाले 50 वर्षों के भविष्य और उसकी शारीरिक संरचना पर भी पड़ता है।

    क्या हैं 'जायंट बेबी' और क्यों गोल-मटोल दिखने वाले बच्चे वास्तव में खतरे की घंटी हैं?

    अक्सर हमारे समाज में मोटे और गोल-मटोल शिशुओं को स्वस्थ और प्यारा माना जाता है, लेकिन चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से यह उनके सुनहरे भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा है:

    • किसे कहते हैं जायंट बेबी: चिकित्सा जगत में जन्म के समय नवजात शिशु का सामान्य वजन 2.5 किलोग्राम से लेकर 4 किलोग्राम तक आदर्श माना जाता है। यदि किसी नवजात का वजन जन्म के समय 4.5 किलोग्राम या उससे अधिक होता है, तो उसे 'जायंट बेबी' कहा जाता है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इस स्थिति को 'फीटल मैक्रोसोमिया' (Fetal Macrosomia) नाम दिया गया है।

    • आंतों के कैंसर (बाउल कैंसर) का खतरा: अमेरिका के विख्यात येल स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक व्यापक अध्ययन में बेहद डराने वाले आंकड़े सामने आए हैं। शोध में पाया गया कि जिन लोगों का जन्म औसत से अधिक वजन (जायंट बेबी के रूप में) के साथ हुआ था, उनमें 50 साल की उम्र पार करने से पहले ही आंतों के कैंसर (बाउल कैंसर) होने का खतरा अन्य सामान्य बच्चों की तुलना में कई गुना अधिक पाया गया। इसके अतिरिक्त, ऐसे बच्चों में युवावस्था में ही मोटापा, कम उम्र में दिल का दौरा और डायबिटीज का खतरा बना रहता है।

    गर्भ के भीतर का माहौल और बढ़ा हुआ इंसुलिन स्तर बिगाड़ रहा है बच्चों का मेटाबॉलिज्म

    लंदन के किंग्स कॉलेज की वरिष्ठ पोषण वैज्ञानिक डॉ. कैथरीन डेलरिम्पल के अनुसार, बच्चे का जन्म के समय जरूरत से ज्यादा भारी होना सीधे तौर पर गर्भाशय के अंदरूनी माहौल को दर्शाता है। गर्भधारण करने से कुछ महीने पहले से लेकर पूरे 9 महीनों तक मां के शरीर की जो परिस्थितियां होती हैं, वे बच्चे के मेटाबॉलिज्म को हमेशा के लिए प्रोग्राम कर देती हैं:

    • इंसुलिन का ग्रोथ हार्मोन में बदलना: जब कोई गर्भवती महिला अत्यधिक मात्रा में मीठा या अस्वास्थ्यकर भोजन खाती है, तो उसके रक्त में ग्लूकोज (शुगर) का स्तर बहुत बढ़ जाता है। यह अतिरिक्त ग्लूकोज प्लेसेंटा (गर्भनाल) के जरिए सीधे गर्भस्थ शिशु के खून में पहुंचने लगता है।

    • शरीर में चर्बी का जमा होना: ग्लूकोज की इस भारी मात्रा को नियंत्रित करने के लिए शिशु का छोटा और नाजुक अग्न्याशय (पैनक्रियाज) बहुत अधिक मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन करने लगता है। इंसुलिन शरीर में केवल शुगर को ही नियंत्रित नहीं करता, बल्कि यह एक बेहद सक्रिय 'ग्रोथ हार्मोन' की तरह भी काम करता है। इसके चलते गर्भ के भीतर ही शिशु की कोशिकाएं असाधारण रूप से बढ़ने लगती हैं और उसके अंगों के आसपास भारी मात्रा में चर्बी (फैट) जमा होने लगती है, जो उसे 'जायंट बेबी' बना देती है।

    • गर्भावधि मधुमेह (जेस्टेशनल डायबिटीज): डॉक्टरों का कहना है कि जो महिलाएं गर्भावस्था के दौरान अपने मधुमेह (शुगर) को नियंत्रित नहीं रखती हैं, उनके बच्चों का विकास पूरी तरह से प्रभावित हो जाता है और वे जन्म से ही कई मेटाबॉलिक विकारों के साथ दुनिया में कदम रखते हैं।

    गर्भावस्था में ज्यादा चीनी खाने से बच्चों में 25% तक बढ़ता है डिप्रेशन और एंग्जायटी का रिस्क

    एक अन्य बेहद ही महत्वपूर्ण शोध रिपोर्ट में यह पाया गया है कि गर्भावस्था के दौरान मीठे का अत्यधिक सेवन करना बच्चों के मस्तिष्क के विकास (ब्रेन डेवलपमेंट) के लिए एक धीमे जहर की तरह काम करता है। इससे बच्चों में भविष्य में गंभीर मानसिक रोग और एडीएचडी (ADHD) जैसी दिमागी बीमारियां होने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है:

    • इतिहास से मिला बड़ा सबूत (बेबी बूमर स्टडी): वैज्ञानिकों ने साल 1946 से 1964 के बीच जन्मे लोगों (जिन्हें बेबी बूमर कहा जाता है) के मानसिक स्वास्थ्य का गहन विश्लेषण किया। इस अध्ययन में पाया गया कि इस पीढ़ी के लोगों में आज के दौर के मुकाबले एंग्जायटी (चिंता), डिप्रेशन (अवसाद) और अन्य मानसिक विकार बेहद कम थे।

    • चीनी पर पाबंदी का असर: शोधकर्ताओं ने इसके पीछे का ऐतिहासिक कारण ढूंढ निकाला। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लंबे समय तक चीनी पर सरकारी राशनिंग और कड़े प्रतिबंध लागू थे, जिसके कारण उस दौर की गर्भवती महिलाओं ने चाहकर भी चीनी का अधिक सेवन नहीं किया था। अध्ययन के आंकड़े दर्शाते हैं कि जिन बच्चों का गर्भधारण साल 1953 में चीनी पर लगी पाबंदी हटने से पहले हुआ था, उनमें जीवन के उत्तरार्ध में मानसिक बीमारियों का खतरा 25 प्रतिशत तक कम देखा गया।

    • शुरुआती 1000 दिनों का महत्व: जर्नल साइकेट्री में प्रकाशित निष्कर्षों के अनुसार, गर्भधारण के पहले दिन से लेकर शिशु के जन्म के बाद शुरुआती 1,000 दिन उसके दिमागी और न्यूरोलॉजिकल विकास के लिए सबसे नाजुक और महत्वपूर्ण अवधि होती है। इस दौरान मां के रक्त में शर्करा (शुगर) का थोड़ा सा भी असंतुलन बच्चे के न्यूरॉन्स के विकास को हमेशा के लिए बाधित कर सकता है।

    सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में बदलाव की मांग; होने वाली माताओं के लिए विशेषज्ञों की विशेष सलाह

    इस वैश्विक शोध के सामने आने के बाद दुनिया भर के स्वास्थ्य संगठनों ने सरकारों से मांग की है कि गर्भवती महिलाओं और शिशुओं के लिए बनने वाली पब्लिक हेल्थ गाइडलाइंस में चीनी और प्रोसेस्ड फूड के हानिकारक प्रभावों की चेतावनी को प्रमुखता से शामिल किया जाए।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई महिला गर्भधारण की योजना बना रही है, तो उसे कम से कम तीन महीने पहले से ही अपनी डाइट में रिफाइंड शुगर (सफेद चीनी) की मात्रा को न्यूनतम कर देना चाहिए और इसकी जगह प्राकृतिक मिठास जैसे फलों का उपयोग करना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान नियमित ब्लड शुगर की जांच कराना और डॉक्टर के निर्देशों का कड़ाई से पालन करना ही आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ, दीर्घायु और निरोगी जीवन देने का एकमात्र रास्ता है।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here