कानपुर | समाज में रिश्तों के बदलते स्वरूप और संवेदनहीनता को दर्शाने वाला एक बेहद दर्दनाक वाकया शास्त्रीनगर इलाके में सामने आया है। यहाँ एक बुजुर्ग पिता, जिन्होंने पाल-पोसकर अपने दोनों बेटों को काबिल बनाया, जीवन के आखिरी क्षणों में उन्हीं बेटों के सहारे के लिए तरसते रहे। हद तो तब हो गई जब गुजरात में नौकरी करने वाले बड़े बेटे को एक हमदर्द पड़ोसी ने हवाई जहाज का किराया देकर बुलाया, लेकिन वह शहर पहुँचने के बावजूद घर नहीं आया और होटल में ही रुका रहा। बीमार पिता की मौत की खबर मिलने के बाद भी उस कलयुगी बेटे का दिल नहीं पसीजा। अंततः पड़ोसियों और बुजुर्ग के साले ने मिलकर उनका अंतिम संस्कार संपन्न कराया। शास्त्रीनगर के जवाहर पार्क के समीप रहने वाले 60 वर्षीय संतोष सिंह अपनी मानसिक रूप से अस्वस्थ पत्नी रंजीत कौर के साथ रहते थे। उनके दो बेटे हैं—बड़ा बेटा जोगिंदर सिंह उर्फ सन्नी गुजरात में निजी नौकरी करता है (उसकी पत्नी दुबई में है) और छोटा बेटा लकी लखनऊ में रहता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले सात वर्षों से दोनों बेटों या बहुओं ने अपने बुजुर्ग माता-पिता की सुध नहीं ली थी।
पड़ोसी ने खाते में भेजे 12 हजार, फिर भी पिता को देखने नहीं पहुंचा बेटा
मृतक की पत्नी के अनुसार, करीब तीन महीने पहले संतोष सिंह को एक कुत्ते ने काट लिया था, जिसके बाद उन्हें एंटी-रेबीज इंजेक्शन भी लगवाए गए थे। परंतु विगत आठ दिनों से उनकी तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ने लगी। बुजुर्ग दंपत्ति को बेसहारा और तड़पता देख पड़ोसी वेद प्रकाश राठौर ने गुजरात में रह रहे उनके बड़े बेटे सन्नी को फोन कर माता-पिता की गंभीर स्थिति की जानकारी दी। जब बेटे ने पैसे न होने का बहाना बनाया, तो पड़ोसी वेद प्रकाश ने इंसानियत के नाते 18 मई को उसके खाते में 12,000 रुपये ट्रांसफर किए ताकि वह तुरंत फ्लाइट से आ सके। लेकिन सन्नी फ्लाइट की बजाय बस से आया और अपने घर जाने के बजाय फजलगंज के एक होटल में ठहर गया। पड़ोसियों ने होटल जाकर भी उससे घर चलने की मिन्नतें कीं, लेकिन वह नहीं पसीजा।
प्रशासन से गुहार और तीमारदार न होने से इलाज में बाधा
घर पर संतोष सिंह की हालत लगातार और नाजुक होती जा रही थी। स्थिति को भांपते हुए एक अन्य पड़ोसी कृष्ण कुमार सिंह ने 20 मई को सीधे जिलाधिकारी (डीएम) को प्रार्थना पत्र देकर बुजुर्ग के इलाज की गुहार लगाई। वे संतोष सिंह को लेकर हैलट अस्पताल भी गए, जहाँ डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार तो शुरू कर दिया लेकिन देखभाल के लिए किसी सगे-संबंधी की उपस्थिति अनिवार्य बताई। इस उम्मीद में कि बेटा अगले दिन आ जाएगा, पड़ोसी बुजुर्ग को वापस घर ले आए, लेकिन बेटा तब भी गायब रहा। अगले दिन दोबारा डीएम से संपर्क करने पर उन्होंने एक निजी मेडिकल कॉलेज को मुफ्त इलाज के लिए पत्र लिखा और वहाँ ले जाने की व्यवस्था की।
अंतिम समय में बंद किया फोन, साले और पड़ोसियों ने किया अंतिम संस्कार
शुक्रवार की सुबह जब बुजुर्ग को अस्पताल ले जाने की तैयारी हो रही थी, तब पड़ोसियों ने सन्नी को लगातार फोन किए। वह बार-बार 'दस मिनट में आ रहा हूँ' का बहाना बनाता रहा और आखिरकार उसने अपना मोबाइल फोन ही बंद (स्विच ऑफ) कर लिया। इस बीच सरकारी एम्बुलेंस के चालक ने निजी अस्पताल जाने से मना कर दिया, जिसके बाद पड़ोसियों ने निजी एम्बुलेंस का इंतजाम किया। लेकिन अफसोस, अस्पताल रवाना होने से पहले ही संतोष सिंह ने दम तोड़ दिया। पिता की मृत्यु के बाद भी बेटा सामने नहीं आया। इसके बाद पड़ोसियों ने मृतक के साले (दबौली निवासी हरभजन सिंह) को सूचित किया। हरभजन सिंह और मोहल्ले के अन्य जिम्मेदार लोगों ने मिलकर शव को भैरोघाट विद्युत शवदाह गृह पहुँचाया और आंसुओं के बीच उनका अंतिम संस्कार किया।


