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    प्राकृतिक आपदाओं से बढ़ती चुनौती, घरों की तबाही के साथ अर्थव्यवस्था को भी नुकसान

    नई दिल्ली। विश्वभर में बाढ़, भीषण भूकंप, चक्रवात और सुनामी जैसी भयंकर प्राकृतिक आपदाओं के कारण जनजीवन पर पड़ने वाले कुप्रभावों में सबसे बड़ी पीड़ा लोगों के आशियानों के उजड़ने के रूप में सामने आती है। आपदाओं के दौरान घरों के नष्ट होने का अर्थ केवल भौतिक संपत्ति या ईंट-पत्थरों का नुकसान नहीं होता, बल्कि इसके साथ ही परिवारों की जीवनभर की गाढ़ी कमाई, उनकी आजीविका के साधन और बच्चों के भविष्य पर भी गहरा संकट आ जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी किए गए आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले कुल प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान में लगभग तैंतालीस प्रतिशत हिस्सा केवल आवासीय इमारतों को पहुँचने वाली क्षति का होता है।

    हर साल खरबों डॉलर के नुकसान और आवासीय भवनों की भारी हिस्सेदारी

    अंतरराष्ट्रीय संस्था संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार बाढ़, चक्रवात, भूकंप और सुनामी जैसी चार प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं के कारण वैश्विक स्तर पर आवासीय इमारतों को प्रतिवर्ष औसतन लगभग 22,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर यानी भारतीय मुद्रा में करीब 2.16 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। यूएन की रिपोर्ट बताती है कि इन चारों आपदाओं से कुल अनुमानित सालाना नुकसान में केवल आवासीय भवनों की हिस्सेदारी बावन से तरेपन प्रतिशत के आसपास है। ये आंकड़े इस बात को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त हैं कि आपदाओं से होने वाली तबाही के पैमाने को न्यूनतम करने के लिए भवनों को अधिक सुरक्षित एवं मजबूत बनाना तथा आम नागरिकों को संभावित खतरों से निपटने के लिए पूर्व तैयारी करना कितना आवश्यक है।

    बेघर होने वाले परिवारों को झेलना पड़ता है विस्थापन और दुखों का दंश

    संयुक्त राष्ट्र के विश्लेषण के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित कुल आबादी में लगभग आधे लोग वे होते हैं जिनके मकान या तो आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं अथवा पूरी तरह धराशायी हो जाते हैं। अपने आशियाने उजड़ जाने के उपरांत इनपीड़ित परिवारों को लंबे समय तक विस्थापन का भीषण दर्द, रोजगार के अवसरों की समाप्ति तथा मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बनाने में अत्यंत गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। घर के अभाव में बच्चों की स्कूली शिक्षा पूरी तरह बाधित होती है और अस्थायी राहत शिविरों या खुले आसमान के नीचे लंबी अवधि तक जीवन बिताने के कारण लोगों के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर भी बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

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