मुंबई (महाराष्ट्र)। बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने अदाणी समूह के प्रमुख गौतम अदाणी के बड़े भाई विनोद अदाणी के विरुद्ध लगाए गए तमाम गंभीर आरोपों को आधिकारिक रूप से खारिज कर दिया है। सेबी ने न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (MPS) के उल्लंघन और कॉरपोरेट धोखाधड़ी से जुड़े सभी आरोपों को समाप्त कर दिया है। नियामक अपनी विस्तृत जांच के दौरान यह साबित करने में विफल रहा कि विनोद अदाणी ने उन दो विदेशी फंडों का प्रत्यक्ष नियंत्रण किया था, जिन्होंने अदाणी समूह की चार प्रमुख कंपनियों में निवेश कर रखा था।
सेबी के अंतिम आदेश के मुख्य बिंदु
सेबी ने अपने 81 पृष्ठों के विस्तृत और अंतिम आदेश में इस पूरे प्रकरण की आधिकारिक जानकारी साझा की है। जांच के दौरान यह तथ्य स्थापित नहीं हो सका कि विनोद अदाणी ने 'इमर्जिंग इंडिया फोकस फंड्स' (EIFF) और 'ईएम रिसर्जेंट फंड' (EMR) के दैनिक निवेश निर्णयों को किसी भी प्रकार से निर्देशित किया था। इसके अतिरिक्त, 'ओपल इन्वेस्टमेंट्स' द्वारा अदाणी पावर में किए गए निवेश पर भी उनका नियंत्रण होना सिद्ध नहीं हो पाया। सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वार्ष्णेय ने स्पष्ट किया कि संपूर्ण जांच-पड़ताल के बाद भी नियामक पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि विनोद अदाणी का उन दो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के निवेश और निर्णयों पर कोई नियंत्रण था।
न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (MPS) के नियम और निष्कर्ष
मौजूदा नियमों के अंतर्गत 'न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता' (MPS) प्रावधान के तहत किसी भी सूचीबद्ध कंपनी में कम से कम 25 प्रतिशत सार्वजनिक स्वामित्व होना अनिवार्य होता है। सेबी ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि एमपीएस का उल्लंघन तभी माना जाता है, जब सार्वजनिक शेयरधारकों के नाम पर रखे गए शेयर वास्तव में प्रमोटर या प्रमोटर समूह के स्वामित्व या प्रत्यक्ष नियंत्रण के अधीन हों। हालांकि, इस मामले में लगाए गए शुरुआती आरोपों में कभी यह दावा नहीं किया गया था कि विनोद अदाणी इन विदेशी निवेशों के वास्तविक लाभार्थी मालिक (Beneficial Owner) थे या उन्होंने इसके लिए वित्तीय पोषण किया था।
नियंत्रण साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्यों का अभाव
नियामक को जांच के दौरान ऐसा कोई भी पुख्ता प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि विनोद अदाणी या उनके प्रमोटर समूह के लोग उन शेयरों के वास्तविक मालिक थे। सेबी का यह स्पष्ट मत रहा कि किसी भी व्यक्ति पर वास्तविक नियंत्रण का आरोप सिद्ध करने के लिए ठोस और अकाट्य साक्ष्यों की आवश्यकता होती है। केवल संदेह या सतही व्यावसायिक व वित्तीय संबंधों के आधार पर नियंत्रण का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसके साथ ही, नियामक को इस बात का भी कोई दस्तावेजी सबूत हाथ नहीं लगा कि विनोद अदाणी ने नसीर अली शबान अहली या चैंग चुंग लिंग जैसी हस्तियों को नियंत्रित किया हो।
निवेश सलाह समझौते और अन्य कड़ियों की समीक्षा
जांच के दौरान यह आरोप भी लगाया गया था कि गल्फ एशिया, लिंगो, गल्फ अरिज और मिड-ईस्ट के निवेशों का वित्तपोषण नसीर अली शबान अहली द्वारा किया गया था, और अदाणी समूह की कंपनियों के शेयर खरीदने से संबंधित निवेश सलाह 'एक्सेल इन्वेस्टमेंट एडवाइजरी सर्विसेज लिमिटेड' द्वारा दी जाती थी, जिस पर विनोद का नियंत्रण होने का दावा था।
हालांकि, सेबी ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि 'एक्सेल' और 'ग्लोबल मैक्रो एसेट मैनेजमेंट लिमिटेड' (GMAML) के मध्य केवल एक सामान्य सलाहकार समझौता हुआ था, जो कानूनी रूप से किसी प्रकार का नियंत्रण स्थापित नहीं करता है, क्योंकि उस समझौते में स्पष्ट रूप से दी गई सलाह को गैर-बाध्यकारी बताया गया था।
अन्य पक्षों पर जुर्माना और समझौता
चूंकि न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (MPS) उल्लंघन का मूल आरोप ही सिद्ध नहीं हो सका, इसलिए धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार प्रथाओं की रोकथाम (PFUTP) विनियमों के अंतर्गत लगाए गए अन्य संबंधित आरोप भी स्वतः समाप्त हो गए।
यद्यपि, सेबी ने गलत तथा अधूरी जानकारी प्रदान करने या विवरण देने में विफल रहने के मामले में नसीर अली शबान अहली और चैंग चुंग लिंग पर 20-20 लाख रुपये का मौद्रिक जुर्माना लगाया है। इस प्रकरण में तीसरे नोटिसधारी तेजल रामलाल देसाई को इस आरोप के लिए उत्तरदायी नहीं पाया गया। इसके अतिरिक्त, अदाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड और अन्य संबंधित कंपनियों ने गौतम अदाणी सहित 13 अन्य निदेशकों के साथ मिलकर एमपीएस से जुड़ी कार्रवाई का पृथक रूप से निपटारा कर लिया था, जिसके तहत गत 26 अगस्त 2026 को 1,48,20,000 रुपये की राशि का भुगतान किया जा चुका है।


