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    महाभारत युद्ध में 100 पुत्र खोने के बाद कैसा गुजरा धृतराष्ट्र और गांधारी का बाकी जीवन, पांडवों ने कैसा किया व्यवहार

    महाभारत में किसी ने अगर सबकुछ गंवाया और सबसे बड़ा दुख झेला तो महाराजा धृतराष्ट्र और उनकी पत्नी गांधारी थीं. दुर्योधन समेत सभी 100 पुत्रों को इस युद्ध ने लील लिया. राजपाट, वैभव सब चला गया. जिस सम्मान से उन्होंने जीवन जिया, वो भी चला गया. महाभारत युद्ध के बाद राजपाट पांडवों के पास आ गया. युधिष्ठिर राजा बन गये. अब धृतराष्ट्र और गांधारी को उन्हीं की कृपा पर जीना था तो दोनों का बाकी जीवन कैसा गुजरा. पांडवों ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया.

    युधिष्ठिर के नए राजा बनने के साथ भीम नए युवराज बने. इस नई स्थिति में धृतराष्ट्र खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे. भीम तो मौके-बेमौके उनका अपमान भी कर देते थे. ऐसे में उन दोनों की जीवन कैसे बदल गया. वो इस युद्ध के बाद कब तक जिये.
    महाभारत के युद्ध के बाद धृतराष्ट्र और गांधारी का जीवन दुख वाला हो गया. महाभारत में दोनों के बाद के जीवन के बारे में वन पर्व और आश्रमवासिक पर्व में बताया गया है. जिसमें उनकी भावनात्मक स्थिति, संन्यास की यात्रा और अंतिम समय का जिक्र है. महाभारत के मूल संस्कृत ग्रंथ (व्यास द्वारा रचित) के साथ और इसके विभिन्न अनुवादों में धृतराष्ट्र और गांधारी के युद्ध के बाद की जिंदगी के बारे में बताया गया है.

    युद्ध के बाद का जीवन
    महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया, जिसमें कौरवों और पांडवों के बीच भयंकर संग्राम हुआ. युद्ध जब खत्म हुआ तो पांडव और कृष्ण उनसे मिलने गए तो दोनों दुखी भी थे और कहीं ना कहीं अंदर क्रोध में भी भरे हुए. इसी वजह से जब भीम और धृतराष्ट्र के मिलने की बारी आई तो कृष्ण ने भीम के लोहे के पुतले को वहां रखवा दिया. जिसे धृतराष्ट्र ने इतनी जोर से भींचा कि वो चकनाचूर हो गया.

    गांधारी ने जब अपनी आंख पर बंधी पट्टी के निचले हिस्से से युधिष्ठिर के पैर के अंगूठे की ओर देखा तो वो काला पड़ गया. कृष्ण को क्रुद्ध गांधारी ने शाप ही दे दिया. गांधारी ने श्रीकृष्ण को शाप दिया था कि उनका कुल भी उसी तरह नष्ट हो जाएगा जैसे कुरु कुल नष्ट हुआ. यह शाप बाद में यादव वंश के विनाश का कारण बना.

    युधिष्ठिर ने पूरा सम्मान दिया
    हालात ऐसे थे कि धृतराष्ट्र और गांधारी कहीं जा भी नहीं सकते थे. अंदर से पांडवों के साथ रहने का उनका मन भी नहीं था. महाभारत कहती है कि दोनों ने महल छोड़कर जाने का उपक्रम किया तो युधिष्ठिर ने उन्हें रोक लिया. सम्मान भी दिया. उन्हें रहने के लिए महल और सेवक – सेविकाएं दीं. कोशिश की कि दोनों ये महसूस नहीं करें कि उनका कोई अनादर हो रहा है.
    शोक से कभी नहीं उबर पाए
    जब युधिष्ठिर का राजा के तौर पर अभिषेक हुआ तो धृतराष्ट्र को खासतौर पर उस समारोह में शामिल रखा गया. युधिष्ठिर अक्सर उनसे सलाह भी लिया करते थे. लेकिन धृतराष्ट्र और गांधारी दोनों को मालूम था कि वो अब निरापद हो चुके हैं. वह महल में रहते जरूर थे लेकिन अपने पुत्रों के शोक से कभी उबर नहीं पाए. उनका दुख ये भी था कि उन्हें बार बार ये भी लगता था कि जिन पांडवों के साथ वो रह रहे हैं, वही उनके पुत्रों की हत्या के लिए ही नहीं उनकी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं.
    उन्हें हस्तिनापुर में हर किसी की निगाह उनका माखौल उड़ाती हुई लगती थी. भीम तो अक्सर उन्हें चुभती हुई बातें कहते थे. धृतराष्ट्र तो जन्म से अंधे थे. गांधारी ने पति के प्रति समर्पण में अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी थी, दोनों ही शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर हो चुके थे. उनकी दिनचर्या में शोक, पश्चाताप और अपने कर्मों पर चिंतन शामिल था.

    15 साल हस्तिनापुर में रहते रहे
    युद्ध के बाद लगभग 15 वर्ष तक धृतराष्ट्र और गांधारी हस्तिनापुर में रहे. इस दौरान युधिष्ठिर ने उनकी हरसंभव देखभाल की. भीम का व्यवहार धृतराष्ट्र को बहुत चुभता था. भीम, दुर्योधन का सबसे बड़ा शत्रु था, कभी-कभी अपने कटाक्षों से धृतराष्ट्र को उनके पुत्रों की मृत्यु की याद दिलाता था.
    गांधारी, दूसरी ओर अधिक संयमित और धार्मिक स्वभाव की थीं. वे अपने दुख को भक्ति और तप में डुबोने की कोशिश करती थीं. दोनों ही अपने जीवन के अंतिम वर्षों में यह महसूस करने लगे थे कि अब उन्हें सांसारिक जीवन से मुक्ति लेनी चाहिए. 15 साल बाद विदुर ने धृतराष्ट्र को संन्यास लेने की सलाह दी.
    फिर वन की ओर चले गए
    महाभारत के आश्रमवासिक पर्व के अनुसार, युद्ध के 15 वर्ष बाद धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से वन में जाने की अनुमति मांगी. वे अपने जीवन के अंतिम समय को तप और प्रायश्चित में बिताना चाहते थे. गांधारी ने भी उनके साथ जाने का फैसला किया. उनके साथ पांडवों की माता कुंती ने भी वन की ओर प्रस्थान किया. क्योंकि वो भी अपने जीवन के अंतिम चरण में थीं. पुत्रों से दूर रहकर तप करना चाहती थीं.

    धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती ने हस्तिनापुर से विदा ली. वन में एक आश्रम में रहने लगे. यहां उनकी दिनचर्या में ध्यान, तपस्या और आत्मचिंतन शामिल था. वे अपने पिछले कर्मों के लिए प्रायश्चित करना चाहते थे. इस दौरान युधिष्ठिर और अन्य पांडव उनसे मिलने आए, जिससे यह संकेत मिलता है कि उनके बीच पारिवारिक संबंध पूरी तरह टूटे नहीं थे.
    वन में आग से हुई मृत्यु
    वन में रहते हुए, एक दिन जंगल में आग लग गई. यह घटना महाभारत के मौसल पर्व से पहले की है. आग इतनी भयंकर थी कि धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती उससे बच नहीं सके. उन्होंने इसे अपने जीवन का अंत मानकर इसे स्वीकार कर लिया. आग में प्राण त्याग दिए.
    तब कितनी थी उम्र
    उनकी आयु के बारे में महाभारत में स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन अनुमान के आधार पर कुछ विद्वान मानते हैं कि युद्ध के समय धृतराष्ट्र लगभग 70-80 वर्ष के रहे होंगे, क्योंकि उनके पुत्र दुर्योधन की आयु उस समय 30-40 वर्ष के आसपास थी. युद्ध के बाद 15 वर्ष और जीवित रहने के कारण उनकी मृत्यु के समय आयु लगभग 85-95 वर्ष के बीच हो सकती थी. गांधारी, जो धृतराष्ट्र से कुछ वर्ष छोटी थीं, की आयु भी लगभग 80-90 वर्ष रही होंगी.

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