रायपुर: छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित 3,200 करोड़ रुपये के शराब घोटाले (Liquor Scam) में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक बार फिर बड़ा एक्शन लिया है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने इस घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में करीब 200 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियां कुर्क (जब्त) कर ली हैं। ईडी के मुताबिक, ये तमाम संपत्तियां भ्रष्टाचार और घोटाले की अवैध कमाई से खड़ी की गई थीं।
इस ताजा कार्रवाई के बाद ईडी द्वारा अब तक इस पूरे मामले में कुर्क की जा चुकी संपत्तियों का कुल आंकड़ा 1,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। इसके साथ ही ईडी ने विशेष अदालत में अपनी छठी (6th) पूरक चार्जशीट (Supplementary Charge-sheet) भी दाखिल कर दी है, जिसमें 4 नए लोगों को नामजद किया गया है। इसके बाद इस सिंडिकेट में कुल आरोपियों की संख्या बढ़कर 89 हो गई है।
गोवा का लग्जरी 'होटल वेस्टिन' हुआ कुर्क
ईडी की इस कार्रवाई में सबसे बड़ी जब्ती गोवा में हुई है। जांच एजेंसी ने गोवा स्थित एक बेहद आलीशान रिसॉर्ट ‘होटल वेस्टिन’ (Hotel Westin) को कुर्क किया है, जिसकी बाजार में अनुमानित कीमत करीब 110 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के भाठागांव इलाके में स्थित लगभग 30 करोड़ रुपये की व्यावसायिक संपत्ति और भिलाई समेत अन्य शहरों की संपत्तियों को भी सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया है।
शेल कंपनियों के जरिए गोवा, दिल्ली और मुंबई में निवेश
ईडी की जांच में यह साफ हुआ है कि छत्तीसगढ़ आबकारी विभाग से लूटे गए इस पैसे को खपाने के लिए एक बेहद जटिल नेटवर्क तैयार किया गया था:
पैसों का रूट: घोटाले की काली कमाई को सफेद करने के लिए रायपुर, भिलाई से लेकर दिल्ली, मुंबई और गोवा तक शेल कंपनियां (फर्जी कंपनियां) बनाई गईं।
कमीशनखोरी का सिंडिकेट: अवैध मुनाफे और कमीशन के पैसों को मैनेज करने के लिए 'ओम साईं बेवरेजेस', 'दिशिता वेंचर्स' और 'नेक्सजेन पावर' जैसी कंपनियां खड़ी की गई थीं। इन कंपनियों से जुड़ी लगभग 51 करोड़ रुपये की संपत्ति भी फ्रीज की गई है। भिलाई के कुछ बड़े कारोबारी इस पूरे सिंडिकेट का मुख्य हिस्सा थे जो फंड ट्रांसफर की कमान संभाल रहे थे।
कैसे अंजाम दिया गया यह पूरा घोटाला?
जांच एजेंसियों के अनुसार, साल 2019 से 2023 के बीच छत्तीसगढ़ में एक संगठित आपराधिक गिरोह (सिंडिकेट) सक्रिय था, जिसने सरकारी राजस्व को भारी चपत लगाई:
नकली होलोग्राम और अवैध बिक्री: डिस्टिलरीज (शराब फैक्ट्रियों) से सीधे अवैध शराब बिना रिकॉर्ड के निकाली जाती थी। इस पर नकली होलोग्राम लगाए जाते थे और सरकारी शराब दुकानों के जरिए ही कैश में बेचा जाता था, जिसका पैसा सरकारी खजाने में जाने के बजाय सीधे सिंडिकेट के पास पहुंचता था।
हर पेटी पर फिक्स कमीशन: शराब की हर एक पेटी के परिवहन (ट्रांसपोर्ट), बॉटलिंग और बिक्री पर प्रति पेटी के हिसाब से मोटा कमीशन तय था, जो राजनीतिक रसूखदारों और अफसरों की जेब में जाता था।
रियल एस्टेट पर नजर: ईडी का कहना है कि शराब घोटाले से कमाए गए इस अकूत धन का एक बड़ा हिस्सा देश के नामी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स और जमीनों को खरीदने में निवेश किया गया है। फिलहाल, इस मामले की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं और आने वाले दिनों में कुछ और रसूखदार चेहरों पर शिकंजा कसा जा सकता है।


