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    हीरों के पट्टे और सोने के गहने पहनते थे शाही कुत्ते, चर्चा में फिर आए जूनागढ़ के नवाब

    जूनागढ़। शाही वस्त्रों से सुसज्जित और एक राजसी सिंहासन पर विराजमान जूनागढ़ के नवाब मुहम्मद महाबत खानजी तृतीय की ऐतिहासिक तस्वीरें आज भी लोगों को हैरत में डाल देती हैं। इन तस्वीरों में नवाब के ठीक बगल में मोतियों का कीमती हार पहने बैठा एक कुत्ता सबका ध्यान अपनी ओर खींचता है। जहां देश के अन्य राजा-महाराजाओं को महंगी गाड़ियों, शिकार या बेशकीमती हीरों का शौक था, वहीं गुजरात की इस समृद्ध रियासत के अंतिम शासक अपने अनूठे श्वान-प्रेम (कुत्तों के प्रति लगाव) के लिए पूरी दुनिया में विख्यात थे। वर्ष 1898 में जन्मे महाबत खानजी अपने पिता के देहावसान के बाद वर्ष 1911 में जूनागढ़ की गद्दी पर बैठे थे।

    प्रिय कुतिया 'रोशनआरा' का विवाह और शाही खजाना

    नवाब के इस अनोखे शौक का सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 1922 में देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की सबसे अनूठी और भव्य शादियों में से एक का आयोजन किया। यह कोई इंसानी शादी नहीं, बल्कि उनकी सबसे चहेती कुतिया 'रोशनआरा' का विवाह संस्कार था। इस विवाह का निमंत्रण तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन को भी भेजा गया था, हालांकि उन्होंने इसमें आने से असमर्थता जता दी थी। नवाब ने अपनी इस प्रिय कुतिया के विवाह समारोह पर पानी की तरह पैसा बहाया और तत्कालीन समय में करीब 2 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च कर डाली।

    चांदी की पालकी में बारात और पूरे राज्य में तीन दिनों का अवकाश

    रोशनआरा का निकाह मैंगरोल के नवाब के आलीशान गोल्डन रिट्रीवर कुत्ते 'बॉबी' के साथ पूरे रीति-रिवाज से संपन्न हुआ था। इस अनोखे विवाह के उपलक्ष्य में जूनागढ़ राज्य में बकायदा सरकारी छुट्टी घोषित की गई थी और पूरी प्रजा को तीन दिनों तक चलने वाले इस भव्य शाही भोज में आमंत्रित किया गया था। ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार, दुल्हन बनी रोशनआरा को चांदी की नक्काशीदार पालकी में बैठाकर लाया गया था, जबकि दूल्हा बने बॉबी की बारात में 25 अन्य राजसी कुत्ते शामिल थे, जिनके पैरों में सोने के कड़े बंधे थे। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए सड़कों पर जनता का हुजूम उमड़ पड़ा था और महल में कई दिनों तक नाच-गाने का दौर चला था।

    800 कुत्तों का शाही काफिला और कराची पलायन की दास्तान

    नवाब के महल में केवल रोशनआरा ही नहीं, बल्कि विभिन्न विदेशी नस्लों के करीब 800 कुत्ते रहते थे, जिन्हें आम जानवरों की तरह नहीं बल्कि वीआईपी मेहमानों की तरह रखा जाता था। इन बेजुबानों की देखरेख के लिए व्यक्तिगत सेवक, वातानुकूलित (एसी) कमरे, विशेष टेलीफोन लाइनें और एक ब्रिटिश पशु चिकित्सक तैनात था। जब रोशनआरा की मृत्यु हुई, तो नवाब ने पूरे राज्य में राजकीय शोक की घोषणा की थी। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के समय नवाब ने जूनागढ़ का विलय पाकिस्तान में करने का प्रयास किया, लेकिन जन-आक्रोश और भारतीय सेना के हस्तक्षेप के बाद वे विमान से कराची भाग गए। जल्दबाजी में हुए इस पलायन के दौरान वे अपनी एक बेगम और बच्चे को यहीं भूल गए, लेकिन अपने वफादार कुत्तों को विमान में बैठाकर साथ ले गए। वर्ष 1959 में कराची में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका यह अनोखा श्वान-प्रेम इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।

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