कोलकाता: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों ने बगावत करते हुए 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में अपना विलय कर लिया है। सांसदों का यह कदम फिलहाल दल-बदल विरोधी कानून के तहत अपनी संसद सदस्यता बचाने का एक अस्थाई तरीका है, क्योंकि उनका असली इरादा पूरी टीएमसी पर ही अपना नियंत्रण स्थापित करना है। इस योजना को पूरी तरह लागू करने की तैयारी जुलाई में संसद के मानसून सत्र के दौरान की जाएगी। सांसद काकोली घोष दस्तीदार और सुदीप बंदोपाध्याय की अगुवाई में इन 20 सांसदों ने ममता बनर्जी से अलग अपनी एक नई राजनीतिक राह चुन ली है।
टीएमसी पर कब्जे की रणनीति
बागी गुट का नेतृत्व कर रहे सुदीप बंद्योपाध्याय के अनुसार, नियमानुसार जब आप किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों के साथ अलग होते हैं, तो शुरुआत में ही उस पार्टी के नाम और निशान पर दावा नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि उन्होंने पहले एक दूसरी पार्टी में विलय किया। अब जुलाई में होने वाले संसद सत्र के दौरान यह बागी गुट लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के सामने बहुमत के आधार पर खुद को असली टीएमसी घोषित करने की मांग रखेगा। एक बार संसद से हरी झंडी मिलने के बाद, इनका अगला कदम चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाकर पार्टी के नाम और प्रतीक चिन्ह (सिंबल) पर अपना दावा ठोकना होगा। बागी सांसदों का मानना है कि दो-तिहाई बहुमत होने के कारण असली टीएमसी पर उनका ही हक बनता है।
चुनाव आयोग की भूमिका और चुनौतियां
अगर बागी गुट चुनाव आयोग के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखता है, तो ममता बनर्जी को अपनी ही बनाई पार्टी के नाम और सिंबल से हाथ धोना पड़ सकता है। इससे पहले महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार के साथ भी ऐसा ही हो चुका है। आमतौर पर जब किसी दल में दो फाड़ होते हैं, तो चुनाव आयोग यह देखता है कि पार्टी के संगठन, पदाधिकारियों और जिला अध्यक्षों में किसका पलड़ा भारी है। संगठन के मामले में फिलहाल ममता बनर्जी की पकड़ मजबूत है, लेकिन हाल के दिनों में शिवसेना और एनसीपी के मामलों में चुनाव आयोग ने संगठन से ज्यादा सांसदों और विधायकों की संख्या बल को प्राथमिकता दी थी। इसके अलावा आयोग यह भी जांचेगा कि पार्टी के भीतर यह बगावत उसके अपने संविधान के नियमों के दायरे में हुई है या नहीं।
अदालत में अंतिम फैसले की उम्मीद
यदि चुनाव आयोग को लगता है कि यह पूरा विवाद बेहद पेचीदा है और इस पर तुरंत कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता, तो वह अंतरिम तौर पर टीएमसी के नाम और सिंबल को फ्रीज (प्रतिबंधित) कर सकता है। ऐसी स्थिति पैदा होने पर दोनों ही गुटों को अस्थाई रूप से नए नाम और नए चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएंगे। चुनाव आयोग का फैसला चाहे जिसके भी पक्ष में आए, यह तय माना जा रहा है कि असंतुष्ट पक्ष राहत के लिए तुरंत सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगा, जिसके बाद इस पूरे विवाद का अंतिम फैसला अदालत की लंबी कानूनी लड़ाई से ही तय होगा।


