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    यहूदियों की धरती पर मुसलमानों की मौजूदगी की कहानी, सदियों पुराना है इतिहास

    यरूशलम। इजरायल में हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों के परिणाम आने के बाद वहां की राजनीति में एक नया समीकरण बनता नजर आ रहा है। देश की 120 सीटों वाली संसद में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 19 सीटों पर कब्जा जमाया है, जिसके चलते वे सरकार गठन में 'किंगमेकर' की भूमिका में आ गई हैं। इस सियासी हलचल के बीच दुनिया भर में यह चर्चा तेज हो गई है कि खुद को आधिकारिक रूप से यहूदी राष्ट्र कहने वाले इजरायल में आखिर करीब 20 प्रतिशत आबादी अरब मूल के लोगों की कैसे है और वहां इन नागरिकों का सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक जीवन कैसा है।

    1948 के इतिहास से जुड़ी है इजरायली अरबों की कहानी

    इस पूरी आबादी की पृष्ठभूमि वर्ष 1948 में इजरायल के गठन और उस दौरान हुए संघर्षों से जुड़ी हुई है। उस कालखंड में इस भूभाग पर रहने वाले लाखों फिलिस्तीनी अरबों को अपना पुश्तैनी घर-बार छोड़कर विस्थापित होना पड़ा था, लेकिन एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने इलाकों में ही रह गया था। बाद में इन परिवारों को इजरायल की औपचारिक नागरिकता प्रदान कर दी गई, जिन्हें आज 'इजरायली अरब' के तौर पर जाना जाता है। मौजूदा समय में ये लोग वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी जैसे क्षेत्रों में रहने वाले फिलिस्तीनी अरबों से अलग पहचान रखते हैं। कुल आबादी का पांचवां हिस्सा यानी लगभग 20 प्रतिशत आबादी इन्हीं लोगों की है, जिसमें करीब 80 प्रतिशत मुस्लिम, और शेष ईसाई तथा ड्रूज समुदाय के लोग शामिल हैं। इनमें से कई नागरिक अपनी पहचान सीधे तौर पर फिलिस्तीन से भी जोड़ते हैं।

    नागरिक अधिकार और भेदभाव के आरोप

    इजरायली सरकार का हमेशा से यह दावा रहा है कि देश के संविधान के तहत सभी नागरिकों को समान कानूनी और नागरिक अधिकार प्राप्त हैं। हालांकि, धरातल पर अरब समुदाय के लोग इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए खुद को दोयम दर्जे का नागरिक महसूस करते हैं। बीबीसी और अमेरिकी विदेश मंत्रालय की विभिन्न रिपोर्टों के साथ-साथ वर्ष 2000 के दंगों की जांच के लिए गठित 'ऑर कमीशन' ने भी अपनी रिपोर्ट में यह माना था कि सरकारी तंत्र का रुख इस समुदाय के प्रति अक्सर भेदभावपूर्ण रहा है। यही वजह है कि कई बार अरब सांसदों ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह देश यहूदियों के लिए लोकतांत्रिक और अरबों के लिए एक सख्त यहूदी राष्ट्र की भांति कार्य करता है।

    आवास, भूमि और आर्थिक असमानता की बड़ी चुनौतियां

    भौगोलिक रूप से, इजरायल में अरब समुदाय की सबसे सघन आबादी उत्तरी हिस्से में बसी हुई है, जिसमें नाजरेथ, उम्म अल-फहम और सखनिन जैसे शहर प्रमुख हैं। इसके अलावा हाइफा, जाफा और एकर में दोनों समुदाय साथ-साथ रहते हैं। दक्षिणी इजरायल के नेगेव मरुस्थल में लगभग 1.60 लाख बेडौइन अरब निवास करते हैं, जिनमें से करीब आधे लोग ऐसी बस्तियों में रहते हैं जिन्हें सरकार की ओर से कोई आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं है। इन अनधिकृत बस्तियों में सड़क, पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है। इसके अतिरिक्त, 1948 के बाद से जमीन का अधिकार छिन जाना इस समुदाय की सबसे बड़ी पीड़ा रही है। एडवोकेसी समूहों के आंकड़ों के मुताबिक, देश की कुल आबादी का 20 फीसदी हिस्सा होने के बावजूद इन लोगों के पास कुल जमीन का मात्र 3 प्रतिशत हिस्सा ही है। आर्थिक मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक है, जहाँ आधे से अधिक इजरायली अरब परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने को मजबूर हैं, जबकि यहूदी परिवारों में यह अनुपात महज 15 प्रतिशत के आसपास है।

    कानूनी विसंगतियां और राजनीति में बढ़ता दखल

    मोसावा एडवोकेसी सेंटर जैसे मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इजरायल के कम से कम 20 ऐसे कानून हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अरब नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, अरबी को आधिकारिक भाषा का दर्जा तो हासिल है, लेकिन उसे हिब्रू जैसी प्राथमिकता नहीं मिलती। इसके अलावा राष्ट्रीय अवकाशों की सूची में भी यहूदी पर्वों को तरजीह दी जाती है। दूसरी ओर, राजनीतिक पटल पर 1966 तक सैन्य शासन के अधीन रहे इन नागरिकों ने अब अपनी सियासी ताकत का अहसास कराना शुरू कर दिया है। हालिया चुनावों में 'जॉइंट लिस्ट' को 11 और 'राम पार्टी' को 8 सीटें मिलने से यह साफ हो गया है कि इजरायल की सत्ता की चाबी अब काफी हद तक अरब दलों के हाथों में भी आ चुकी है, भले ही इस समुदाय का एक वर्ग अब भी व्यवस्था पर अविश्वास जताते हुए चुनाव से दूरी बनाए रखता हो।

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