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    नीट-2026 :परीक्षा रद्द करने से परीक्षार्थियों को होने वाले मानसिक तनाव के लिए जिम्मेदार कौन?

    नीट-2026 रद्द होने से प्रतियोगी व प्रवेश परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर गहराया संकट

    निलेश
    निलेश

    त्वरित टिप्पणी : निलेश कांठेड़

    केंद्र व राज्य सरकारें प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक व नकल रोकने के लिए भले ही कागजों में कानून सख्त कर लें, लेकिन हकीकत यह है कि पेपर माफिया और नकल कराने वाले गिरोहों के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं। परीक्षाओं की पवित्रता और विश्वसनीयता गहरे संकट में दिखाई दे रही है। इन गिरोहों में कानून का कोई भय नजर नहीं आता और इस बार इनकी चपेट में देशभर के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आयोजित नीट-2026 परीक्षा भी आ गई।

    राजस्थान पुलिस की एसओजी और खुफिया एजेंसियों को परीक्षा से पहले पेपर लीक होने के पुख्ता संकेत मिलने के बाद परीक्षा आयोजक नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) ने 3 मई को आयोजित नीट-2026 परीक्षा रद्द कर दी। केंद्र सरकार ने मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी है।

    परीक्षा रद्द करने का यह फैसला उन 23 लाख विद्यार्थियों के सपनों से खिलवाड़ जैसा है, जिन्होंने कठिन मेहनत और बड़ी उम्मीदों के साथ परीक्षा दी थी। पेपर लीक गिरोहों पर लगाम नहीं लगा पाने की प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की विफलताओं की सजा उन प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को भुगतनी पड़ रही है, जिन्होंने दिन-रात मेहनत कर यह परीक्षा दी थी। एनटीए का यह निर्णय उनकी उम्मीदों पर तुषारापात जैसा है।

    एनटीए ने पुनः परीक्षा के लिए नया रजिस्ट्रेशन या अतिरिक्त फीस नहीं लेने की बात कही है, लेकिन इससे उस मानसिक क्षति की भरपाई नहीं हो सकती जो परीक्षा रद्द होने के कारण परीक्षार्थियों को झेलनी पड़ रही है। फीस लौटाई जा सकती है, लेकिन मानसिक तनाव और असुरक्षा की भावना को कैसे लौटाया जाएगा? ईश्वर न करे, यदि कोई प्रतिभावान विद्यार्थी इस मानसिक दबाव को सहन नहीं कर पाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

    सरकारी तंत्र को इस निर्णय के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। परीक्षा रद्द होने का असर केवल 23 लाख विद्यार्थियों पर ही नहीं, बल्कि उनके माता-पिता पर भी पड़ता है, जिन्होंने अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए अपनी नींद, चैन और सुख-शांति तक दांव पर लगा दी। बच्चे तनाव में होंगे तो माता-पिता भी कभी निश्चिंत नहीं रह पाएंगे।

    इस निर्णय से सबसे अधिक नुकसान उन प्रतिभाओं को होगा, जिन्होंने कठिन परिश्रम के बल पर सफलता की मजबूत नींव रखी थी और एमबीबीएस में प्रवेश के सपने संजोए हुए थे। अब दोबारा परीक्षा में वे वैसी ही सफलता प्राप्त कर पाएंगे या नहीं, यह कोई नहीं कह सकता। हर विद्यार्थी की मानसिक स्थिति एक जैसी नहीं होती। यदि कोई भावनात्मक रूप से कमजोर पड़ जाए और स्वयं को फिर से तैयार नहीं कर पाए, तो उसके भविष्य को होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

    राजस्थान में कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार के निर्देश पर आरपीएससी ने पुलिस उप निरीक्षक (एसआई) भर्ती परीक्षा-2021 निरस्त की थी। अब नीट-2026 का रद्द होना पूरे परीक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

    सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के लिए यह राजनीति का विषय नहीं, बल्कि गंभीर चिंतन का मुद्दा होना चाहिए कि आखिर पेपर माफिया और नकल गिरोहों के मन में कानून का भय क्यों नहीं पैदा हो पा रहा है। युवाओं और विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले अपराधियों के लिए ऐसी कठोर सजा सुनिश्चित होनी चाहिए कि भविष्य में कोई भी गिरोह पैसे के लालच में पेपर लीक, नकल या डमी अभ्यर्थी बैठाने की हिम्मत न कर सके।

    याद रखना चाहिए कि गोली से केवल वही व्यक्ति मरता है जिस पर निशाना साधा जाता है, लेकिन पेपर लीक से लाभ भले कुछ लोगों को मिले, मानसिक पीड़ा उन सभी विद्यार्थियों को होती है जो परीक्षा में शामिल होते हैं। ऐसे में पेपर लीक और नकल कराना किसी भी दृष्टि से सामान्य अपराध नहीं माना जा सकता। इस कुकृत्य में शामिल अपराधियों और उन्हें संरक्षण देने वालों पर हत्या जैसे गंभीर मामलों की तरह सख्त धाराओं में कार्रवाई होनी चाहिए।

    जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक परीक्षाओं की पारदर्शिता और विश्वसनीयता कायम करना तथा पेपर और नकल माफिया का समूल नाश करना संभव नहीं होगा। सरकार को उन कोचिंग संस्थानों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई करनी चाहिए, जिनकी भूमिका प्रश्नपत्र लीक कराने या नकल कराने में संदिग्ध पाई जाती है।

    प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं की पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित किए बिना कोई भी सरकार सुशासन का दावा नहीं कर सकती।

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