दीपावली से पहले पंचायत चुनाव की रंगत, घर-घर वोट मांग रहे प्रत्याशी; कहीं मिठाई तो कहीं अनाज और जरूरतमंदों तक पहुंच रहे उपहार
मुकेश सोनी, अलवर। इस बार गांवों में दीपावली का उत्साह कुछ अलग ही रंग लेकर आया है। एक ओर कार्तिक अमावस्या पर प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में घर-घर घी और तेल के दीये जलेंगे, वहीं दूसरी ओर पंचायती राज चुनाव के परिणाम गांवों में अपनी नई सरकार बनने का जश्न भी लेकर आएंगे। इस बार ग्रामीण अंचल में दीपावली के साथ लोकतंत्र का उत्सव भी मनाया जाएगा। इसलिए गांवों की यह दीपावली दोहरी खुशियों वाली होने जा रही है।
मान्यता है कि 14 वर्ष का वनवास पूरा कर जब प्रभु श्रीराम कार्तिक मास की अमावस्या को अयोध्या लौटे थे, तब अयोध्यावासियों ने घी के दीये जलाकर पूरी नगरी को रोशन कर दिया था। अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बना वही पर्व आज दीपावली के रूप में मनाया जाता है। इस बार गांवों में भी कुछ ऐसा ही उल्लास दिखाई दे रहा है। फर्क इतना है कि इस बार त्योहार की रोशनी के साथ गांव की चौपालों पर लोकतंत्र की नई उम्मीद भी जगमगा रही है।
एक दीया राम के नाम, दूसरा गांव की नई सरकार के नाम
दीपावली से ठीक पहले हो रहे पंचायती राज चुनाव ने गांवों के उत्सव को नया रंग दे दिया है। घरों में दीपक जलेंगे तो चुनावी नतीजों के बाद जीतने वाले पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य के समर्थक भी जश्न मनाएंगे। किसी घर में प्रभु श्रीराम के स्वागत की खुशी होगी तो किसी चौपाल पर गांव की नई सरकार बनने का उत्साह दिखाई देगा।
ग्रामीणों के लिए यह चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने बीच से नेतृत्व चुनने का अवसर भी है। गांव का सरपंच, पंचायत समिति और जिला परिषद में प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य अब गांव के लोगों के वोट से तय होंगे। इसे लोकतंत्र की गांवों तक पहुंच और स्थानीय नेतृत्व की नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
वोट की मनुहार के साथ घर-घर पहुंच रही मदद
इस चुनाव की एक दिलचस्प तस्वीर दीपावली से पहले गांवों में देखने को मिल रही है। प्रत्याशी और उनके समर्थक घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क कर रहे हैं। कोई हाथ जोड़कर समर्थन मांग रहा है तो कोई बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद ले रहा है। चुनावी प्रचार के इन दौरों के बीच जरूरतमंद परिवारों तक भी सहायता पहुंचने की बातें सामने आ रही हैं।
कहीं अनाज बांटा जा रहा है, कहीं कंबल और मिठाइयां दी जा रही हैं तो कहीं अन्य उपहारों के जरिए लोगों तक पहुंच बनाई जा रही है। ऐसे में चुनावी मौसम में अन्नपूर्णा और लक्ष्मी की कृपा की प्रतीकात्मक चर्चा भी गांवों की चौपालों पर हो रही है। हालांकि, मतदाताओं के लिए जरूरी है कि वे किसी भी उपहार या प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना अपने विवेक और गांव के हित को ध्यान में रखकर मतदान करें।
मतदाता के हाथ में गांव के भविष्य का दीया
इस बार ग्रामीण मतदाता के सामने दीपावली और चुनाव दोनों की जिम्मेदारी है। एक ओर घर-आंगन को दीयों से रोशन करना है तो दूसरी ओर मतदान के जरिए गांव के भविष्य का रास्ता चुनना है। एक वोट केवल किसी प्रत्याशी की जीत-हार तय नहीं करता, बल्कि गांव के विकास, शिक्षा, पेयजल, सड़क, स्वच्छता और जनसुविधाओं से जुड़े फैसलों पर भी असर डालता है।
ऐसे में मतदाताओं के लिए यह अवसर है कि वे योग्य, ईमानदार और गांव की समस्याओं को समझने वाले प्रतिनिधियों का चयन करें। दीपावली पर एक दीया घर की खुशियों के लिए जलेगा तो मतदान का दीया गांव के बेहतर भविष्य की उम्मीद जगाएगा।
त्योहार की रोशनी में लोकतंत्र का उत्सव
इस बार गांवों में दीपावली की शुभकामनाओं के साथ चुनावी जीत की बधाइयां भी सुनाई देंगी। कहीं प्रत्याशियों के समर्थक जीत का जश्न मनाएंगे तो कहीं हार-जीत से परे गांव के लोग मिलकर त्योहार की खुशियां बांटेंगे। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है कि चुनाव के बाद भी गांव की एकता और भाईचारा कायम रहना चाहिए।
सचमुच, इस बार गांवों की दीपावली केवल घरों को रोशन करने का पर्व नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नई उम्मीदों का उत्सव भी बनने जा रही है। एक ओर अयोध्या में प्रभु श्रीराम के आगमन की स्मृति में दीप जलेंगे तो दूसरी ओर गांवों में अपने प्रतिनिधियों के चयन के साथ नई शुरुआत का उजाला फैलेगा।
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