देशज जल ज्ञान और सामुदायिक प्रबंधन से सूखे के असर को किया जा सकता है कम, पारंपरिक जल संरचनाओं वाले क्षेत्रों में जल उपलब्धता बनी रहने का दावा
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अलवर। भारत में वर्ष 2026-27 को सुपर अल नीनो का वर्ष माना जा रहा है। इसका प्रभाव देश के सभी हिस्सों में एक समान नहीं होगा। पश्चिमी राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु के साथ तेलंगाना, आंध्र प्रदेश तथा बुंदेलखंड के कुछ क्षेत्रों में इसके गंभीर प्रभाव की आशंका जताई जा रही है। ऐसे समय में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जल संकट से निपटने का रास्ता क्या है? इसका एक महत्वपूर्ण उत्तर है—हमारी पारंपरिक जल संरक्षण परंपरा और सामुदायिक जल प्रबंधन की समझ, जिसे जल मेधा कहा जा सकता है।

तरुण भारत संघ और राष्ट्रीय जल बिरादरी ने मिलकर भारत के विभिन्न भौगोलिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों का तुलनात्मक अध्ययन किया है। इसमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के उन क्षेत्रों की स्थिति को समझने का प्रयास किया गया, जहां समाज ने अपने देशज ज्ञान से जल संरक्षण किया है और उन क्षेत्रों की भी पड़ताल की गई, जहां जल संरक्षण के कार्य मुख्य रूप से सरकारी प्रयासों के माध्यम से हुए हैं। लोगों के अनुभव, पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक समझ के आधार पर यह अध्ययन 30 अक्टूबर को पूरा हुआ।
कई क्षेत्रों में पेयजल और पशुओं के लिए चारे का संकट
दक्षिण भारत के मराठवाड़ा और कोंकण क्षेत्र, कर्नाटक के घाट क्षेत्र तथा महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में लोगों ने बताया कि उन्होंने पहले कभी ऐसे हालात नहीं देखे। सितंबर-अक्टूबर में ही पीने के पानी का संकट खड़ा हो गया है। पशुओं के लिए चारा और पानी उपलब्ध नहीं होने से पशुपालकों को अपने दुधारू पशु बेचने तक पड़ रहे हैं।
इसके विपरीत कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं, जहां सामुदायिक स्तर पर जल संरक्षण के साथ जल के अंधाधुंध दोहन और प्रदूषण पर नियंत्रण के प्रयास किए गए हैं। कई स्थानों पर भूजल भंडार खाली हो चुके हैं। वर्षा नहीं होने पर पानी की उपलब्धता घट जाती है। बांधों में पानी कम होने के बावजूद उसका समुचित वितरण नहीं हो पाता। खेती और उद्योगों में जल उपयोग की बढ़ती मांग तथा पानी की अनधिकृत निकासी भी संकट को गहरा रही है।
जलग्रहण क्षेत्र में हरियाली से बचा पानी
महाराष्ट्र के बांध अपेक्षाकृत गहरे होने के बजाय अधिक फैले हुए हैं। ऐसे में पानी की सतह अधिक होने के कारण सूर्य की गर्मी से वाष्पीकरण की समस्या बढ़ सकती है।
महाराष्ट्र के सतारा, सोलापुर और सांगली से निकलने वाली अग्नि नदी कर्नाटक में भी लगभग 62 किलोमीटर का सफर तय करके समुद्र में मिलती है। इसके लगभग 400 वर्ग किलोमीटर के जलग्रहण क्षेत्र में अच्छी खेती और पर्याप्त भूजल उपलब्ध होने का उदाहरण सामने आया है। इसका एक प्रमुख कारण जलग्रहण क्षेत्र में घास और हरे जंगलों की मौजूदगी है, जिससे मिट्टी का कटाव कम होता है।
यहां लोगों ने वर्षा जल संरक्षण के साथ पानी के उपयोग की दक्षता भी बढ़ाई है। कम वर्षा में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के प्रयास किए गए हैं। इससे खेती और जनजीवन पर वर्षा के उतार-चढ़ाव का असर अपेक्षाकृत कम पड़ता है। भूजल का अत्यधिक दोहन करने के बजाय उपलब्ध जल भंडारों का संतुलित उपयोग किया जाता है।
मिट्टी में नमी बने रहने, हरियाली बढ़ने और मिट्टी का कटाव कम होने से प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलती है। ऐसे क्षेत्रों में जलवायु के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने की क्षमता अधिक दिखाई देती है।
सामुदायिक जल प्रबंधन वाले क्षेत्रों में बेहतर स्थिति
भारत में जहां-जहां समुदाय ने विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन को अपनाया है, वहां अल नीनो के प्रभावों का सामना करने की क्षमता अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है। राजस्थान के हरे-भरे और मरुस्थलीय क्षेत्रों में भी इसका अंतर देखा जा सकता है। चंबल क्षेत्र और मत्स्य क्षेत्र की जल उपलब्धता में भी अंतर सामने आता है।
मरुस्थलीय थार क्षेत्र इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। भारत-पाकिस्तान सीमा से लगे इलाकों में तरुण भारत संघ ने स्थानीय समुदाय और सरकार के सहयोग से टांके, कुंड, बावड़ियां, बेरी, खड़ीन और सरोवर जैसी पारंपरिक जल संरचनाओं के निर्माण एवं पुनर्जीवन का कार्य किया है। कम वर्षा और पेयजल संकट वाले इस क्षेत्र में भी कई गांवों ने जल उपलब्धता बनाए रखी है।
कर्नाटक के गडग क्षेत्र और इचनहला नदी के जलग्रहण क्षेत्र के गांवों में भी पारंपरिक जल संरचनाओं के कारण पानी की उपलब्धता का उदाहरण मिलता है। आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिलती है।
देशज ज्ञान ही है जल मेधा
इन उदाहरणों के पीछे स्थानीय समाज का अपना देशज ज्ञान और प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर पानी के उपयोग की परंपरा है। इसी सामूहिक समझ को जल मेधा कहा गया है। इसमें पानी को केवल संसाधन नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के साझा जीवन का आधार माना जाता है।
दुनिया के कम वर्षा वाले मरुस्थलीय क्षेत्रों में भी पारंपरिक जल प्रबंधन के माध्यम से बड़ी संख्या में ऊंटों और लोगों के लिए पानी की व्यवस्था की जाती रही है। भारत की पारंपरिक जल मेधा ने अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में पानी उपलब्ध कराने के रास्ते विकसित किए थे। यह ज्ञान आज भी मौजूद है, लेकिन समाज में इसके प्रति समझ और विश्वास कमजोर हुआ है।
जल मेधा से जलवायु संकट का सामना
तरुण भारत संघ ने पारंपरिक जल मेधा को पुनर्जीवित करने और सामुदायिक जल प्रबंधन को मजबूत करने के माध्यम से अल नीनो, बाढ़ और सूखे जैसी चुनौतियों का सामना करने का प्रयास किया है। इस काम में स्थानीय समुदाय की भागीदारी, पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन और जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण महत्वपूर्ण आधार रहे हैं।
इसी कार्य के लिए तरुण भारत संघ को वर्ष 2015 में विश्व के प्रतिष्ठित स्टॉकहोम वाटर प्राइज से सम्मानित किया गया था। इसे जल संरक्षण के क्षेत्र का महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मान माना जाता है।
समाधान के लिए समाज को फिर अपनानी होगी जल मेधा
वर्ष 2026-27 में सुपर अल नीनो की आशंका के बीच पारंपरिक जल ज्ञान को फिर से अपनाने की आवश्यकता है। गांवों और शहरों में वर्षा जल का संचयन, स्थानीय जल संरचनाओं का संरक्षण, भूजल के संतुलित उपयोग, जलग्रहण क्षेत्रों में हरियाली और समुदाय की भागीदारी को प्राथमिकता देनी होगी।
सरकारों के प्रयास तभी स्थायी परिणाम दे सकते हैं, जब समाज भी जल संरक्षण की जिम्मेदारी साझा करे। सुपर अल नीनो जैसी जलवायु चुनौतियों का सामना केवल बड़े बांधों या बाहरी संसाधनों के भरोसे नहीं किया जा सकता। इसके लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल प्रबंधन और पीढ़ियों से अर्जित देशज ज्ञान को महत्व देना होगा।
जल मेधा केवल अतीत की परंपरा नहीं, बल्कि भविष्य की जल सुरक्षा का आधार बन सकती है।
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