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    अन्नदाता हुंकार रैली: किसान महापंचायत के नेतृत्व में जयपुर में जुटे प्रदेशभर के किसान, 9 ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे निरस्त करने का संकल्प

    अन्नदाता हुंकार रैली: किसान महापंचायत के नेतृत्व में जयपुर में जुटे प्रदेशभर के किसान, 9 ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे निरस्त करने का संकल्प

    मिशनसच न्यूज, जयपुर | 

    देश की खाद्य सुरक्षा, कृषि भूमि संरक्षण और किसान-केंद्रित राजनीति की मांग को लेकर किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट के नेतृत्व में मंगलवार को जयपुर के बाईस गोदाम मैदान में भव्य अन्नदाता हुंकार रैली का आयोजन किया गया। इस रैली में राजस्थान के विभिन्न जिलों से हजारों किसान अपने निजी खर्चे पर वाहनों से जयपुर पहुंचे। रैली की विशेष बात यह रही कि इसमें न तो किसी राजनीतिक दल का मंच था और न ही भीड़ जुटाने के लिए किसी प्रकार का प्रलोभन, बल्कि भोजन एवं अन्य व्यवस्थाएं भी स्वयं किसानों द्वारा की गईं।

    यह रैली उन राजनीतिक आयोजनों से बिल्कुल अलग रही, जहां आमतौर पर “आना-फ्री, जाना-फ्री, खाना-फ्री” की संस्कृति देखने को मिलती है। अन्नदाता हुंकार रैली में शामिल किसान अपनी समस्याओं, अधिकारों और भविष्य को लेकर सजग, संगठित और संकल्पबद्ध नजर आए।

    दो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित

    रैली में दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किए गए।

    पहला प्रस्ताव: किसान-केंद्रित राजनीति व ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था

    पहले प्रस्ताव में पूंजीवादी और सामंती व्यवस्था को बेरोजगारी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। किसानों ने कहा कि उपनिवेशवादी सोच के तहत गांवों से लघु व कुटीर उद्योगों को समाप्त किया गया, जिससे युवाओं को रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन करना पड़ा। उदाहरण देते हुए बताया गया कि 24 लाख आवेदकों में से केवल 53 हजार युवाओं को ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी मिलती है, शेष युवा बेरोजगारी और तनाव की स्थिति में रह जाते हैं।

    इसका समाधान गांवों को स्वायत्त बनाकर ग्राम उद्योगों को बढ़ावा, कृषि उपज के लाभकारी दाम, और शहर-गांव संसाधन वितरण में समानता को बताया गया। इसी प्रस्ताव में भारत माला परियोजना के अंतर्गत प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे को दोहरे मापदंड का उदाहरण बताया गया। किसानों ने कहा कि जहां पूंजीपतियों के लिए यात्रा समय कम किया जा रहा है, वहीं किसानों के लिए खेतों तक पहुंचने की दूरी, समय और लागत बढ़ाई जा रही है।

    लोकतंत्र में मताधिकार की भूमिका पर जोर देते हुए नारा दिया गया—
    “वे जाति-धर्म से तोड़ेंगे, हम मूंग-चने से जोड़ेंगे”,
    और समान आर्थिक हितों के आधार पर मतदान करने की अपील की गई।
    साथ ही “बीती रात हो गई भोर, चलो किसानों राज की ओर” के उद्घोष के साथ किसानराज की अवधारणा को आगे बढ़ाने का आह्वान किया गया।

    दूसरा प्रस्ताव: सरसों का मूल्य निर्धारण

    दूसरे प्रस्ताव में किसानों ने अपने उत्पादों का मूल्य स्वयं तय करने का संकल्प लिया। देशभर के किसानों ने सरसों का मूल्य 6500 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित करते हुए इससे कम दाम पर बिक्री न करने का निर्णय लिया।

    गत वर्ष सरसों का MSP 5950 रुपये था, जबकि 2026-27 के लिए इसे 6200 रुपये घोषित किया गया है, जो मात्र 4.2% वृद्धि है। किसानों ने तर्क दिया कि जब कर्मचारियों का महंगाई भत्ता 5% तक बढ़ता है, तो किसानों को भी उनकी संपूर्ण लागत (C-2) पर डेढ़ गुना लाभ मिलना चाहिए। बजटीय गणना के अनुसार MSP 6837 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए, इसके बावजूद किसानों ने 6500 रुपये पर सहमति जताई।

    कृषि भूमि बचाने का संकल्प

    किसानों ने स्पष्ट शब्दों में कहा—
    “जान दे देंगे, लेकिन सड़कों के लिए जमीन नहीं देंगे।”
    प्रस्तावित 9 ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे निरस्त होने तक संघर्ष जारी रखने और सड़कों की बजाय सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता देने की मांग की गई। यमुना, चंबल, माही और सिंधु जैसी नदियों का पानी आज भी किसानों तक नहीं पहुंच पाने पर नाराजगी जताई गई।

    प्रमुख वक्ताओं ने किया संबोधन

    सभा को प्रदेश संयोजक सत्यनारायण सिंह, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रोताश बोहरा, महासचिव अकबर खान, प्रदेश अध्यक्ष मुसद्दी लाल यादव, युवा प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर चौधरी सहित अनेक पदाधिकारियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने संबोधित किया। मध्यप्रदेश और हरियाणा से आए किसान नेताओं ने भी रैली को समर्थन दिया।

    3 अक्टूबर को सरकार से हुई वार्ता की पालना न होने पर किसानों ने मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच किया, जिसे पुलिस ने रोका। इसके बाद 5 सदस्यीय शिष्टमंडल की मुख्य सचिव से वार्ता हुई।

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