दिल्ली में आयोजित पहल ने सदियों पुरानी जड़ों को जोड़ा, पहचान और विरासत पर हुआ मंथन
अलवर। घुमंतू और विमुक्त समुदायों के सशक्तिकरण के लिए कार्य कर रही World Comics India की पहल पर राजधानी नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक संवाद आयोजित किया गया, जिसमें अलवर के घुमंतू समुदायों और यूरोप के रोमा प्रतिनिधियों के बीच सांस्कृतिक सेतु स्थापित हुआ। यह आयोजन Indira Gandhi National Centre for the Arts में हुआ।
इस संवाद में अलवर के कालबेलिया, बंजारा, नाथ, कंजर और गाड़िया लोहार समुदायों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और यूरोप के रोमा समुदाय के सदस्यों से सीधा संवाद किया। इतिहासकारों के अनुसार, रोमा समुदाय की जड़ें भारत, विशेष रूप से राजस्थान से जुड़ी मानी जाती हैं, जो सदियों पहले प्रवास कर यूरोप के विभिन्न देशों में बस गए।

शरद शर्मा के नेतृत्व में संगठन लंबे समय से इन समुदायों के साथ जमीनी स्तर पर कार्य कर रहा है। वर्तमान में अलवर में संचालित 8 डीएनटी कम्युनिटी सेंटरों के प्रतिनिधियों ने इस संवाद में भाग लेकर अपने अनुभव साझा किए।
संगठन का कार्य केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समुदायों को अपनी कहानी खुद कहने का अवसर भी देता है। “विमुक्त आवाज़” और ग्रासरूट्स कॉमिक्स जैसे प्रयासों के जरिए इन समुदायों के जीवन, संघर्ष और इतिहास को दस्तावेज़ित किया जा रहा है।
इस पहल के तहत कई प्रतिभागियों ने पहली बार अलवर से बाहर निकलकर इस अनुभव में हिस्सा लिया, जो उनके लिए आत्मविश्वास और पहचान से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर बना। संवाद के दौरान प्रतिभागियों ने रोमा समुदाय के साथ अपनी संस्कृति, पहनावे, संगीत और जीवनशैली में अद्भुत समानताएं महसूस कीं।
रोमा प्रतिनिधि Erika Varga, Helena Varga और Lili Kristen ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे हंगरी में भेदभाव और चुनौतियों के बावजूद अपनी संस्कृति को कला, डिजाइन और शोध के माध्यम से जीवित रखे हुए हैं।
संवाद के दौरान दोनों समुदायों के पारंपरिक पहनावे, आभूषण और सांस्कृतिक वस्तुओं की तस्वीरें साझा की गईं, जिनमें आश्चर्यजनक समानताएं देखने को मिलीं। इससे प्रतिभागियों को यह अहसास हुआ कि भौगोलिक दूरी के बावजूद उनकी सांस्कृतिक पहचान आज भी गहराई से जुड़ी हुई है।
बंजारा समुदाय के एक प्रतिनिधि मुकेश ने इस दौरान महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि बदलते समय में अपनी पहचान और संस्कृति को भारत और यूरोप में कैसे सुरक्षित रखा जाए। इस पर हुई चर्चा में यह स्पष्ट हुआ कि परंपराओं को संरक्षित रखना आज घुमंतू समुदायों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
अलवर में पहले से ही घुमंतू मेलों और सामुदायिक आयोजनों के जरिए परंपराओं को जीवित रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। अब एक सामुदायिक संग्रहालय स्थापित करने की दिशा में भी पहल की जा रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों और विरासत से जुड़ी रह सकें।
यह पहल केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सदियों से बिछड़े समुदायों के पुनर्मिलन का एक ऐतिहासिक क्षण साबित हुई, जिसने सांस्कृतिक पहचान, आत्मगौरव और वैश्विक एकजुटता को नई दिशा दी।
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