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    नॉन-प्रॉफिट FIFA इतना बड़ा बिजनेस कैसे चलाता है? ₹1,22,734 करोड़ की कमाई पर सवाल

    नई दिल्ली। अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको की संयुक्त मेजबानी में फुटबॉल इतिहास का सबसे बड़ा फीफा विश्व कप खेला जा रहा है। एक गैर-लाभकारी (नॉन-प्रॉफिट) संस्था होने के बावजूद फीफा इस 48 टीमों वाले महाकुंभ के जरिए साल 2023 से 2026 के व्यावसायिक चक्र में लगभग 13 अरब डॉलर (करीब ₹122734 करोड़) का रिकॉर्ड राजस्व बटोरने की तैयारी में है। 'फेडरेशन इंटरनेशनेल डी फुटबॉल एसोसिएशन' (फीफा) दुनिया भर में फुटबॉल की सर्वोच्च शासी संस्था है, जिसकी स्थापना 1904 में पेरिस में हुई थी और वर्तमान में इसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में है। 211 राष्ट्रीय संघों की सदस्यता वाले इस संगठन का काम सिर्फ वर्ल्ड कप कराना नहीं, बल्कि खेल के नियम बनाना, ट्रांसफर की निगरानी और कोचिंग मानकों को तय करना भी है।

    कमाई में ऐतिहासिक उछाल और बिजनेस मॉडल

    फीफा की कमाई मुख्य रूप से चार साल के चक्र पर आधारित होती है। पिछले कतर विश्व कप (2019-2022) के 7.6 अरब डॉलर के मुकाबले इस बार राजस्व में 72% की भारी बढ़ोतरी देखी जा रही है। इस अप्रत्याशित मुनाफे के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं: टीमों की संख्या का 32 से बढ़कर 48 होना जिससे मैचों की संख्या बढ़ी, अमेरिका जैसे समृद्ध मीडिया बाजार में टूर्नामेंट का आयोजन और वहां एक नए 'क्लब वर्ल्ड कप' की शुरुआत करना। फीफा के खजाने में सबसे बड़ा हिस्सा टीवी ब्रॉडकास्टिंग राइट्स (40% यानी 5.3 अरब डॉलर) से आता है। इसके बाद हॉस्पिटैलिटी व टिकटिंग से 28% (3.6 अरब डॉलर), कोका-कोला व वीज़ा जैसे बड़े ब्रांड्स की स्पॉन्सरशिप से 25% (3.3 अरब डॉलर) और मर्चेंडाइजिंग व वीडियो गेम्स के लाइसेंसिंग से 3% (0.4 अरब डॉलर) की आय होती है।

    बेशुमार दौलत का खर्च और राजनीतिक समीकरण

    एक नॉन-प्रॉफिट संस्था होने के नाते फीफा इस भारी-भरकम राशि को वापस फुटबॉल के विकास में लगाने का दावा करती है। इस बार कतर की तरह नए स्टेडियमों पर खर्च नहीं हो रहा है, बल्कि अमेरिका के मौजूदा एनएफएल स्टेडियमों का उपयोग किया जा रहा है। बजट का 58% (7.6 अरब डॉलर) प्रतियोगिताओं और इनामी राशि पर खर्च होगा, जिसमें से विजेता टीम को 50 मिलियन डॉलर मिलेंगे। वहीं, 30% (3.9 अरब डॉलर) सभी 211 सदस्य देशों को फुटबॉल विकास के लिए ग्रांट के रूप में दिया जाता है और 7% (0.9 अरब डॉलर) प्रशासनिक कार्यों व अधिकारियों के वेतन में जाता है। हालांकि, समीक्षक इस फंडिंग व्यवस्था को एक राजनीतिक 'संरक्षण तंत्र' (पैट्रोनेज मशीन) के रूप में देखते हैं, क्योंकि फंड पाने वाले प्रत्येक देश के पास फीफा अध्यक्ष के चुनाव में एक वोट होता है। कागजों पर मुनाफा न दिखाने के बावजूद फीफा का रिजर्व फंड आज 2.7 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है।

    महंगे टिकट, स्थानीय अर्थव्यवस्था और भविष्य की रणनीति

    इस बार विश्व कप में पहली बार विमान किराए की तरह मांग के आधार पर तय होने वाली 'डायनेमिक प्राइसिंग' प्रणाली लागू की गई है। इसके चलते टिकटों की कीमतें 60 डॉलर से शुरू होकर प्रीमियम कैटेगरी में 32,000 डॉलर तक पहुंच गई हैं, जो 1994 के अमेरिकी विश्व कप की तुलना में करीब 1000% अधिक है। जहां फीफा का दावा है कि मेजबान शहरों को पर्यटन से करोड़ों डॉलर का फायदा होगा, वहीं खेल अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए जीडीपी के 0.1% से भी कम है, जबकि सुरक्षा और परिवहन का खर्च स्थानीय प्रशासन को उठाना पड़ रहा है। इस बीच, भारत जैसे देशों में फुटबॉल की बढ़ती डिजिटल व्यूअरशिप फीफा के लिए एक नया ग्रोथ मार्केट बन रही है। भविष्य को सुरक्षित करने के लिए फीफा अब महिला विश्व कप और क्लब वर्ल्ड कप जैसे आयोजनों का एक बड़ा पोर्टफोलियो तैयार कर रही है, ताकि किसी एक टूर्नामेंट पर निर्भरता कम की जा सके। हालांकि, अत्यधिक व्यावसायीकरण और आसमान छूते दामों के कारण खेल की साख पर भी सवाल उठने लगे हैं।

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