मुंबई। अपनी आगामी फिल्म 'गजब रात' को लेकर इन दिनों सुर्खियों में छाए दिग्गज अभिनेता मनोज बाजपेयी ने हाल ही में एक विशेष साक्षात्कार के दौरान बदलते हुए सिनेमाई परिवेश, फिल्मी पर्दे पर नायक के व्यक्तित्व, कलाकारों के बीच आपसी समानता और शूटिंग सेट पर सामूहिक प्रयासों जैसे विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर खुलकर चर्चा की। इस बातचीत के दौरान उन्होंने अपने अब तक के फिल्मी सफर और किरदारों की गहराई से जुड़े कई अनुभव साझा किए हैं।
पुलिस अधिकारी के किरदारों की विविधता और अभिनय का दृष्टिकोण
अपने करियर में कई बार पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाने वाले मनोज बाजपेयी ने कहा कि वे अभी इस तरह के और भी कई किरदार निभाने वाले हैं, इसलिए अभी से इनकी गिनती नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि उनके लिए हर किरदार अपने आप में बिल्कुल अलग होता है। उन्होंने दर्शकों से अपील की कि वे कभी किसी पुलिस थाने जाकर वहां तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच के तालमेल को नजदीक से देखें। चौबीस घंटे की कठिन ड्यूटी और लगातार साथ काम करने के बावजूद उन सबकी निजी जिंदगी और व्यक्तित्व एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न होते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका पूरा फोकस हमेशा वर्दी के पीछे छिपे उस इंसान और उसके वास्तविक व्यक्तित्व को पर्दे पर उतारने पर रहता है, न कि केवल कागजी वर्दी पर।
'शूल' से लेकर 'गजब रात' तक किरदारों की बदलती परतें और जॉनर
अपनी पिछली चर्चित फिल्मों जैसे 'शूल' से लेकर 'इंस्पेक्टर झेंडे' और अब 'गजब रात' तक के सफर पर बात करते हुए अभिनेता ने कहा कि हर फिल्म का अपना अलग मिजाज, टोनैलिटी और जॉनर होता है। उन्होंने बताया कि 'गजब रात' को पारंपरिक अर्थों में सिर्फ एक कॉप ड्रामा नहीं समझा जाना चाहिए। फिल्म की शुरुआत भले ही पुलिस की कहानी से होती है, लेकिन धीरे-धीरे इसके भीतर किरदारों के आपसी संबंधों, उनके अंतर्द्वंद्व और भरोसे की कई नई परतें खुलती चली जाती हैं। कहानी के आगे बढ़ने के साथ नायक के जीवन के विभिन्न पहलू और अन्य पात्रों के साथ उसके रिश्ते अलग-अलग रंगों में उभरते हैं, जो दर्शकों के लिए एक बेहद दिलचस्प सिनेमाई अनुभव साबित होगा।
फिल्म सेट पर पदानुक्रम को खत्म कर लोकतांत्रिक माहौल बनाने की पहल
सह-कलाकारों के साथ अपने अनुभवों को साझा करते हुए मनोज बाजपेयी ने कहा कि वे अपने शूटिंग सेट पर किसी भी प्रकार के पदानुक्रम या ऊंच-नीच को बढ़ावा नहीं देते। उन्हें पूरी तरह से लोकतांत्रिक सेट संस्कृति पसंद है, जहां कोई भी जूनियर या सीनियर कलाकार बेझिझक उनके पास आ सके और वे भी किसी से भी संवाद कर सकें। उन्होंने माना कि जब एक ही पीढ़ी के कलाकार आपस में मिलकर काम करते हैं, तो विचारों का आदान-प्रदान और एक-दूसरे के अनुभवों से सीखना बेहद आसान हो जाता है। उनके अनुसार सिनेमा का निर्माण किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है, बल्कि यह सभी के सामूहिक प्रयासों का ही परिणाम होता है।
पारंपरिक व्यावसायिक फिल्मों के टेम्पलेट से लेकर आधुनिक सिनेमा तक का सफर
सिनेमा निर्माण की बदलती शैली पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि पहले के दौर में व्यावसायिक फिल्मों के तयशुदा फार्मूले और टेम्पलेट हुआ करते थे, जिसमें गानों, एक्शन दृश्यों और केवल मुख्य नायक के महिमामंडन पर सारा ध्यान केंद्रित रहता था। दर्शकों के मनोरंजन के लिए हर बात पहले से तय होती थी। किंतु आज के दौर में सिनेमा का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। 'गजब रात' जैसी आधुनिक फिल्मों में कहानी का हर पात्र अपनी जगह महत्वपूर्ण होता है और कोई भी कलाकार सिर्फ अपनी छवि चमकाने के लिए काम नहीं कर सकता। आज चाहे ओटीटी के लिए काम किया जाए या बड़े पर्दे के लिए, पूरी टीम को मिलकर एक थिएटर वर्कशॉप की तरह काम करना पड़ता है, क्योंकि अब अकेले दम पर किसी फिल्म को सफल नहीं बनाया जा सकता।


