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    Homeस्वास्थ्यआदिवासी जिलों में बीमारी की दस्तक, स्वास्थ्य विभाग ने जारी किए दिशा-निर्देश

    आदिवासी जिलों में बीमारी की दस्तक, स्वास्थ्य विभाग ने जारी किए दिशा-निर्देश

    पहाड़ों की शांत वादियों वाले हिमाचल प्रदेश के जनजातीय अंचलों में इन दिनों स्वास्थ्य विशेषज्ञ एक गंभीर संक्रामक बीमारी के फैलने की आशंका को लेकर अलर्ट जारी कर रहे हैं। राज्य के सुदूर आदिवासी जिलों— चंबा, किन्नौर और लाहौल-स्पीति में जमीनी स्तर पर किए गए एक व्यापक सामुदायिक स्वास्थ्य सर्वे में चौंकाने वाली बात सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, बीते एक वर्ष के दौरान इन क्षेत्रों में रहने वाले हर पांच में से एक व्यक्ति ने यौन संचारित रोग (एसटीडी) से मिलते-जुलते लक्षणों का सामना करने की बात स्वीकार की है।

    यह महत्वपूर्ण अध्ययन जनजातीय विकास विभाग और शिमला स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) के सामुदायिक चिकित्सा विभाग द्वारा संयुक्त रूप से संचालित किया गया था। इस शोध के नतीजों को स्वास्थ्य वैज्ञानिक एक बड़ी सामूहिक चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। चिंता की बात यह है कि समस्या केवल बीमारी के लक्षणों तक सीमित नहीं है, बल्कि रिपोर्ट से पता चलता है कि एक बड़ी आबादी इस संक्रमण से बचने के सबसे सुलभ और सुरक्षित संसाधनों का उपयोग करने से कतरा रही है।

    सामुदायिक सर्वे के मुख्य और चौंकाने वाले आंकड़े

    जिलाएसटीडी लक्षणों की व्यापकता दर
    चंबा24.2 प्रतिशत
    किन्नौर20.1 प्रतिशत
    लाहौल-स्पीति15.7 प्रतिशत
    औसत व्यापकता (तीनों जिले)20.0 प्रतिशत

    सामाजिक झिझक और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां बनीं रोड़ा

    चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि आज के आधुनिक दौर में भी यौन स्वास्थ्य जैसे विषयों पर खुलकर बात न करना, सामाजिक संकोच और सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच इस समस्या को और अधिक गंभीर बना रही है। लोक-लाज के डर से कई नागरिक शरीर में लक्षण दिखाई देने के बावजूद समय पर चिकित्सीय जांच नहीं कराते। इस गोपनीयता के कारण संक्रमण लंबे समय तक शरीर में दबा रहता है और अनजाने में ही अन्य लोगों तक स्थानांतरित (फैलने) होने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।

    इस विशेष शोध के अंतर्गत 15 से 49 वर्ष के आयु वर्ग के करीब 3,000 नागरिकों को शामिल किया गया था, जिनमें 54.3 प्रतिशत पुरुष और 45.7 प्रतिशत महिलाएं थीं। कुल मिलाकर, कम से कम एक एसटीडी लक्षण की मौजूदगी की दर 20 फीसदी दर्ज की गई है। इन तीनों आदिवासी जिलों में चंबा जिला संक्रमण के लक्षणों के मामले में शीर्ष पर रहा।

    बचाव के उपायों से दूरी और आधी-अधूरी जानकारी

    रिपोर्ट के निष्कर्ष साफ तौर पर इशारा करते हैं कि सुरक्षात्मक उपायों के प्रति घोर लापरवाही ही इस खतरे को बढ़ाने का मुख्य कारण है:

    • सुरक्षा संसाधनों की अनदेखी: सर्वे में शामिल केवल 24.9 प्रतिशत लोगों ने माना कि वे संबंधों के दौरान सुरक्षात्मक साधनों (कंडोम) का नियमित उपयोग करते हैं।

    • शून्य उपयोग दर: इसके विपरीत, 33 फीसदी से अधिक आबादी ऐसी थी जिन्होंने जीवन में कभी भी इन सुरक्षा उपायों का इस्तेमाल नहीं किया।

    • स्क्रीनिंग की बेहद धीमी रफ्तार: जानलेवा बीमारियों जैसे एचआईवी और हेपेटाइटिस की समय पर जांच कराने की दर भी निराशाजनक रूप से केवल 2 प्रतिशत पाई गई।

    अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि लोगों ने इन बीमारियों का नाम (72 प्रतिशत) तो सुन रखा है, लेकिन इसके वैज्ञानिक बचाव को लेकर उनकी समझ आधी-अधूरी है। सिर्फ 46.6 प्रतिशत लोग ही यह जानते थे कि कंडोम का सही इस्तेमाल संक्रमण के इस चक्र को तोड़ने में कारगर साबित हो सकता है।

    क्या कहते हैं सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ?

    शिमला के वरिष्ठ चिकित्सकों का कहना है कि यह शोध उन सुदूर पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों के वास्तविक हालात बयां करता है, जहां आबादी बिखरी हुई है और मौसम की प्रतिकूलता के कारण साल के कई महीने संपर्क कटा रहता है। कठिन भौगोलिक रास्ते और सीमित क्लीनिकल संसाधनों के चलते इन संवेदनशील विषयों पर स्वास्थ्य शिक्षा और स्क्रीनिंग कैंप आयोजित करना स्वास्थ्य कर्मियों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता। आज भी ग्रामीण समाज में इसे एक बेहद गोपनीय और संवेदनशील विषय माना जाता है, जिससे लोग खुलकर डॉक्टरों से अपनी समस्या साझा करने में कतराते हैं।

    अनदेखी से बढ़ सकता है एचआईवी और कैंसर का जोखिम

    चिकित्सा विज्ञान के वैश्विक अध्ययनों के अनुसार, जिन मरीजों में एसटीडी के शुरुआती लक्षण जैसे कि जननांगों में घाव, अल्सर या लगातार सूजन रहती है, उनमें एचआईवी संक्रमण की चपेट में आने का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। क्षतिग्रस्त त्वचा के रास्ते खतरनाक वायरस शरीर में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं।

    इसके साथ ही, कुछ विशेष प्रकार के यौन जनित संक्रमण आगे चलकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का रूप ले सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) का लंबे समय तक बने रहना महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर की मुख्य वजह बनता है। ठीक इसी प्रकार, हेपेटाइटिस बी वायरस का पुराना संक्रमण सीधे तौर पर लिवर कैंसर के जोखिम को आमंत्रित करता है। इसलिए विशेषज्ञ इन सुदूर क्षेत्रों में तत्काल बड़े स्तर पर अवेयरनेस और मेडिकल कैंप लगाने की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं।

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