कोलकाता। सुकांता मजूमदार ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में साफ तौर पर यह वादा किया था कि सत्ता संभालने के बाद समान नागरिक संहिता को अमलीजामा पहनाने के लिए कदम उठाए जाएंगे और केंद्र सरकार उसी संकल्प को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भाजपा केवल घोषणाएं करने में विश्वास नहीं रखती, बल्कि अपने वादों को हकीकत में बदलने का प्रयास करती है। इसके साथ ही उन्होंने पश्चिम बंगाल के संदर्भ में शुभेंदु अधिकारी द्वारा उठाए गए कथित "लव जिहाद" और "लैंड जिहाद" जैसे मुद्दों का जिक्र करते हुए कहा कि इन पर गंभीरता से विचार किया गया है। मजूमदार ने याद दिलाया कि देश की बदलती डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) को लेकर खुद नरेंद्र मोदी चिंता व्यक्त कर चुके हैं और सरकार इन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर नीतियां तैयार कर रही है। उनके मुताबिक, राज्य के सामाजिक संतुलन और बेहतर कानून व्यवस्था के लिए इन विषयों पर कड़े कदम उठाना बेहद जरूरी है।
संवैधानिक समानता और पर्सनल लॉ की चुनौती
मजूमदार ने भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि हमारा संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को बराबरी का हक देता है और इसमें साफ लिखा है कि धर्म, जाति या लिंग के आधार पर किसी से भी कोई भेदभाव नहीं हो सकता। उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ का होना समानता के इस बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ जाता है। उनके अनुसार, एक ही देश के भीतर दो नागरिकों के लिए दो तरह के कानून नहीं हो सकते। समान नागरिक संहिता का असली मकसद सभी के लिए एक जैसा कानूनी ढांचा तैयार करना है, जिससे देश में संवैधानिक न्याय और बराबरी की भावना को और बल मिलेगा।
यूसीसी पर देशव्यापी राजनीतिक और वैचारिक बहस
दूसरी तरफ, समान नागरिक संहिता का यह पूरा मामला देश में लंबे समय से एक बड़ी कानूनी और राजनीतिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है। जहां यूसीसी का समर्थन करने वाले लोग इसे संविधान के समानता के अधिकार को लागू करने के लिए एक बेहद जरूरी और ऐतिहासिक कदम बताते हैं, वहीं इसके विरोध में खड़े लोग अलग-अलग धार्मिक समुदायों के पर्सनल लॉ और उनकी सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर पड़ने वाले असर को लेकर अपनी आशंकाएं जताते रहे हैं। यही वजह है कि इस विषय पर देश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में लगातार अलग-अलग राय और वैचारिक मतभेद देखने को मिल रहे हैं।


