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    अरावली संरक्षण पर पर्यावरणविदों की चिंता, स्वतंत्र समिति गठन की उठी मांग

    अरावली संरक्षण के लिए मुख्य न्यायाधीश को पत्र, निष्पक्ष समिति की मांग तेज

    जयपुर। देशभर के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और संरक्षण संगठनों ने अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से गठित नई समिति की संरचना पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। विशेषज्ञों ने मांग की है कि अरावली जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र की निष्पक्ष समीक्षा के लिए स्वतंत्र और उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए।

    पर्यावरण संरक्षण संगठन वनशक्ति के निदेशक स्टालिन दयानंद ने कहा कि वर्तमान समिति न तो स्वतंत्र है और न ही उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति के मानकों पर खरी उतरती है। उनका कहना है कि जिस रिपोर्ट की समीक्षा की जानी है, उसी मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों के अधीन समिति का गठन हितों के टकराव की स्थिति पैदा करता है।

    संयुक्त संरक्षण आंदोलन (United Conservation Movement) के प्रबंध न्यासी जोसेफ हूवर ने आरोप लगाया कि पूर्व में तैयार रिपोर्टों में अरावली क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों और वन सर्वेक्षण संस्थान (FSI) की टिप्पणियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उन्होंने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा की मांग की।

    प्रख्यात पर्यावरणविद एवं सामाजिक वैज्ञानिक डॉ. रवि चोपड़ा ने अपने पत्र में कहा कि सरकारी अधिकारियों और सरकारी संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञ कई बार स्वतंत्र लिखित राय देने से बचते हैं। ऐसे में अरावली जैसे महत्वपूर्ण विषय पर गठित समिति में स्वतंत्र वैज्ञानिकों, पारिस्थितिकीविदों और विशेषज्ञों को शामिल किया जाना आवश्यक है।

    भूवैज्ञानिक सी. पी. राजेंद्रन ने भी कहा कि समिति की संरचना केवल प्रशासनिक अधिकारियों तक सीमित न होकर पर्यावरण, जलविज्ञान, वन्यजीव, स्वास्थ्य और आजीविका क्षेत्रों के विशेषज्ञों को भी सम्मिलित करे, ताकि व्यापक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ रिपोर्ट तैयार की जा सके।

    पर्यावरण एवं नीति विशेषज्ञ सागर धारा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने अतीत में कई मामलों में स्वतंत्र वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की अध्यक्षता वाली समितियों का गठन किया है। अरावली संरक्षण के मामले में भी इसी परंपरा का पालन किया जाना चाहिए।

    महाराष्ट्र के ‘सेव पुणे हिल्स’ अभियान से जुड़े पुष्कर कुलकर्णी ने कहा कि खनन गतिविधियों का मूल्यांकन केवल पर्यावरणीय प्रभाव तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उससे जुड़े स्वास्थ्य, रोजगार और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर पड़ने वाले असर को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

    लोक शक्ति अभियान के राष्ट्रीय संयोजक एवं पर्यावरणविद प्रफुल्ल समंतरा ने मांग की कि समिति के अध्यक्ष और सदस्य ऐसे स्वतंत्र विशेषज्ञ हों, जो पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के क्षेत्र में अनुभव रखते हों और किसी भी रूप में संबंधित मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में न हों।

    पर्यावरणविद समिता कौर और डॉ. सुमिता काले ने भी समिति में विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल करने, खनन प्रभावित समुदायों से संवाद स्थापित करने तथा रिपोर्ट सीधे सर्वोच्च न्यायालय को प्रस्तुत करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि अरावली संरक्षण जैसे व्यापक विषय पर विस्तृत अध्ययन के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।

    पर्यावरणविदों का मानना है कि अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत के पारिस्थितिक संतुलन, भूजल संरक्षण, जैव विविधता और मरुस्थलीकरण को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए इसके संरक्षण से जुड़े किसी भी निर्णय में वैज्ञानिक निष्पक्षता, पारदर्शिता और व्यापक विशेषज्ञता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

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